Monday, 21 February 2011

सफर में चलते हुए..

मुसाफिर हूँ यारों , न घर है ना ठिकाना.... कुछ यूँ ही गीत गाते हुए सुना डी टी सी  के बस में लोगों और कर्मचारियों के द्वारा ... बस जा रही थी दिल्ली के आसपास शहरी इलाकों में. देवली गाँव से होते हुए नयी दिल्ली की भीड़ में शायद गुम होते हुए डी टी सी की आवाज़ के साथ -साथ ये गीत भी खोता जा रहा है. गीत से ज्यादा लोगों की आवाज़ भी दबती लग रही है. एक दूसरे को ना जानते हुए भी अनजाना नहीं बनते लोग, कुछ मुस्कुराते हुए, कुछ झुन्झुलाते हुए सबकी अपनी "फीलिंग" दिखती है इन बसों में. इसे अंग्रेजी की 'फिल' नहीं समझें, इन्सान इन्सान से अलग हो कर भी एक आम ढांचा दिखता है इस सफ़र में. पूरे हिंदुस्तान की विविधता चमकती है यहाँ, क्योकि मिनी भारत है दिल्ली में... दिल्ली परिवहन निगम के साथ.

Saturday, 19 February 2011

कहते रहो..

ब्लाग्स के बारे में सुना कि ये मन की बात कहने का ज़रिया है। आगे सीखता रहूंगा....