Sunday, 20 November 2011

क्रिकेट से क्यों रूठा है दर्शक?

इन्द्रमोहन कुमार

अभी तक फिक्सिंग के गंभीर आरोप से भारत का क्रिकेट बचता रहा है, जब कभी यह मामला उठता है, तो हम पाक साफ की कामना करते है। कांबली विवाद इसका उदापरण है। अभी तो भारत में क्रिकेट खेल से बढ़कर एक जुनून है। इसे एक धर्म तक की संज्ञा दे दी गई। अब सभी कोशिश कर रहे हैं कि यह आलम बना रहे। बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब भारत में क्रिकेट विश्वकप 2011 का मैच खेला गया। इस दौरान भी कई मैचों में खाली स्टेडियम को देखकर लगा कि इस खेल से लोग दूरी बना रहे हैं। क्रिकेट विश्वकप शुरू होने से पहले लोग कहने लगे थे कि टी-20 के आने के बाद अब एकदिवसीय क्रिकेट के दिन खत्म हो गए हैं। मगर क्रिकेट के आला अधिकारियों और खिलाड़ियों को उम्मीद थी कि अगर भारत यह खिताब जीत जाता है तो यह खतरा भी खत्म हो सकता है।
अब जाने कब दिखेगा ऐसा नजारा: यह तस्वीर है ईडेन गार्डेन में 1996 विश्वकप का, जब भारत सेमीफाइनल में बाहर हो गया था।
 

फिर भी भारत के लीग मैचों के अलावा अन्य किसी भी टीम के मैच के दिन  स्टेडियम पूरा भरा नहीं दिखा। हालांकि भारत जैसे-जैसे श्रृंखला में आगे बढ़ता रहा, रोमांच बढ़ता गया। फिर भी कहना होगा कि विश्वकप के बाद क्रिकेट में फिर वैसी भीड़ नहीं दिखी। पिछले दिनों इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के साथ हुए मैच इस बात के गवाह हैं।

अब आइए इसके कुछ कारण खोजते हैं। जो सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है वो है अत्यधिक क्रिकेट खेला जाना। खिलाड़ी, अधिकारी, बोर्ड और पूर्व दिग्गज भी मान रहे हैं कि हाल के दिनों में कुछ ज्यादा क्रिकेट खेली जा रही है। खिलाड़ियों के फिटनेस से लेकर उनके खेल और प्रदर्शन पर भी अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। निरंतर खेल में निरंतर अच्छा प्रदर्शन देखने को नहीं मिलता है। युवराज सिंह से लेकर सचिन तेंदुलकर तक इसके उदाहरण हैं। ये बात अलग है कि सचिन आज जो भी खेल रहें है वो रिकॉर्ड ही बन रहा है।

हाल ही में भारत-वेस्टइंडीज कोलकाता टेस्ट के पहले दिन तक मात्र 98 टिकट की बुकिंग हुई थी। घरेलू मैदान पर भारत के मैच में ऐसी दिलचस्पी चिंताजनक है। एक समय था जब भारत में रणजी ट्राफी मैच देखने के लिए भी दर्शकों की भारी भीड़ जुटती थी। तब दर्शक टीवी पर अपना चेहरा दिखाने के लिए अपने चेहरे पर तिरंगा नहीं बनवाते थे और न ही अजीबो-गरीब हरकतें करते थे। राजधानी के फिरोजशाह कोटला मैदान और कानपुर के ग्रीन पार्क में 70 के दशक के मैच देखने के लिए भारी भीड़ जुटती थी। वह जुनून तो अब खत्म ही हो गया है। अब दिलीप और देवधर ट्राफी क्या टेस्ट के मैच देखने के लिए गिनती के दर्शक जुट पाते हैं।

एक सच यह है कि अब  खिलाड़ी खेलने से बचने के तमाम बहाने खोजते हैं। मगर ये चोटिल होने पर भी आइपीएल में खेलने से परहेज नहीं करते, क्योंकि हमें आपको सब को पता है कि वहां पैसा बोलता है।

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि क्रिकेटरों के काम का बोझ बढ़ाकर हर तरह के संस्करण के रूप में और हर मौसम में खेलने को क्रिकेट की राशि से जोड़ा गया है। टेस्ट क्रिकेट व एकदिवसीय प्रारूप के शुरूआत के साथ भी यही काम  किया गया। मगर दूसरा तथ्य यह है कि इस खेल को जिंदा रखने की भी जरूरत थी, जिसे लोग धीरे- धीरे मानने लगे।

अभी क्रिकेट को एक और क्रांति की अवधि में देखा जा रहा है। सन् 2000 के बाद खेल का एक फटाफट संस्करण टी-20 की शुरुआत की गई। फुटबॉल और रग्बी की तरह कम अवधी का यह प्रारूप काफी लोकप्रिय हुआ। मगर इस रोमांच का एक दूसरा पक्ष भी देखने को मिला। क्रिकेटरों को इससे अतिरिक्त कमाई हो रहे हैं। हर किसी को अब डर है कि ज्यादातर क्रिकेटरों का भविष्य या करियर कम हो रहा है। शांत क्रिकेट कौशल के दिखावे के लिए अनुमति नहीं देता है, अधिक जोखिम और दिन ज्यादा मायने रखता है।  मगर सवाल है कि दर्शक इन सबके बीच है कहां?

आईसीसी दिन-रात टेस्ट शुरू करने की सोच रही है, मगर व्यस्त लोग सारा दिन काम करते हुए रात में देखने  बैठेंगे या नहीं, यही डर है। जो भविष्य में इस प्रारूप खेलेंगे, वे भी आश्वस्त नहीं है कि कोई भी इसे पूरा कर सकते हैं या नहीं ?  पाकिस्तान के पूर्व कप्तान वसीम अकरम की राय है कि भारत के तेज गेंदबाजों के घायल होने में बहुत अधिक क्रिकेट खेलना बड़ा कारक है। उनका नदारद रहना भी दर्शकों पर असर करता है।  इसका उदाहरण जहीर खान हैं। दर्शक तो यहां अपने स्टार खिलाड़ी को देखना चाहते हैं। तो क्या आप खाली स्टेडियमों के लिए खेलते हैं और टेलीविजन पर एक भाग्य का भुगतान कर खेल को देखती है? यह खेल मृत हो सकता है अगर आप यह सोचते हैं कि दर्शक मैदान में नहीं आते है।

.और यह नजारा है भारत में आयोजित 2011 विश्वकप का जब भारत यह खिताब जीता।
पूरी दुनिया में टेलीविजन कंपनियां क्रिकेट से रकम जुटा रही हैं, पर क्रिकेट ताक पर है। सब कुछ के बाद मैच से पहले शो के साथ 10 घंटे का एक खेल भरता है, तो प्रशासकों को खेल को बेचने के अलावा कुछ नहीं करना है। टीवी कंपनियां सिर्फ अधिकारियों के लिए अधिक से अधिक पैसा बोली रखने पर जोर देती है। तो क्या भविष्य में यह खेल दुखी करेगा? और अगर फिंक्सिंग का फांस दिखेगा तो दर्शक कम होंगे ही।

भारत में क्रिकेट का मक्का कहा जाने वाला ‘कोलकाता- ईडन गार्डेन हमेशा दर्शकों से भरा रहता था, 1,00,000 लोग भीतर और 10,000 से ज्यादा बाहर। सभी जगह भरी रहती थीं। अब दर्शक दीर्घा में काफी कम क्रिकेट प्रेमी दिखाई देते हैं। यही वह मैदान और स्टेडियम है जहां क्रिकेट का जुनून दिखता था। आज आप यह माने या नहीं पर क्रिकेट से दर्शक दूरियां बना रहे हैं।

यह प्रशंसक है। सिर्फ इतना पता है, अगर उन्हें क्रिकेट में डाल दिया तो फिर टेलीविजन हो या स्टेडियम वो रोमांच चाहेंगे, मगर कंपनियों रकम जुटाने के लिए यह कर रही हैं। अब ईएसपीएन, निंबस, सोनी, नियो और प्लस मिल गया है। वे सभी भारत में क्रिकेट के लिए रकम जुटा रहे हैं। तो यह एक बोली युद्ध है। अगर टीवी पर सब बिकेगा तब खेल का कोई मतलब नहीं है, यह बेकार है। अगर लोग आते नहीं और देखते नहीं, तो यह दुर्भाग्य है। क्या आप खाली स्टेडियमों के लिए खेलते हैं और टीवी आपके भाग्य का भुगतान करती है?

क्रिकेट के जनक इंग्लैंड में हालात-
यहां वर्ष 2000 से इस दिशा में लगभग 5.4 मिलियन पाउंड का काम किया जा चुका है। पिछले एक दशक से दर्शकों की सुविधाओं पर भी ध्यान दिया गया है, पर दर्शक का ध्यानाकर्षण नहीं हुआ है। अंग्रेजों द्वारा शुरू इस ‘जेंटलमैन’ खेल को अक्सर ‘लेजीमैन’ का खेल भी कहा जाता है, क्योंकि लोगों के पास इतना समय नहीं है। इसी कारण यूरोप व अमेरिकी महाद्वीपों में यह खेल उतना मशहूर नहीं है।

कुछ और
क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर ने भी वन-डे मैचों को रोमांचक बनाने के लिए आईसीसी को सुझाव दिया, जिसे फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। अब भद्रजनों के इस गेम को लोकप्रिय बनाए रखना ही एक चुनौती लग रहा है। फिक्सिंग का फांस लोगों को अलग से परेशान- हैरान कर रहा है।

याद कीजिए नोएडा का फार्मूला वन रेस। वहां जाने वालों ने कहा कि लगभग 1 लाख लोगों ने इस रप्तार के रोमांच का मजा देखा। वह भी जुनून था। टिकट क्रिकेट से ज्याद महंगा था और भीतर यह नजारा साफ देखा जा सकता था। फिर भी विशेषज्ञों ने इसे खास वर्ग का खेल करार दिया। वह तीन घंटे का रोमांच था जिसे पहली बार भारत में आयोजित किया गया। अब क्रिकेट को धर्म का दर्जा देनेवालों की बारी है..!

Saturday, 5 November 2011

क्रिकेट के पीछे ‘खिलाड़ी’

मैच फिंक्सिंग का फंदा एक बार फिर क्रिकेट को बदनाम कर गया। भद्रजनों का कहा जाने वाला यह जेंटलखेल खासकर युवा खिलाड़ियों को क्रिकेट को भ्रष्टाचार में डुबो रहा है। उससे भी हैरानी भरी बात यह कि इसमें दोषी पाए जाने के बाद पाकितानी क्रिकेटर मोहम्मद आमिर ने कहा कि हमें इससे बचने के लिए बोर्ड से प्रशिक्षणनहीं दिया गया। वाह रे खिलाड़ी! अब आपको बताना होगा कि किस हद तक सट्टेबाजों से बचो या कहां तक मैच फिक्स करो।

क्रिकेट के इतिहास में मैच फिक्सिंग हुए हैं पर यह पहली बार है जब दोषी पाए जाने के बाद क्रिकेटरों को जेल की सजा दी गई है। पाकिस्तान के तीन उभरते क्रिकेटर सलमान बट्ट, मोहम्मद आसिफ और तेज गेंदबाज मोहम्मद आमिर और बुकी मजहर मजीद को स्पॉट फिक्सिंग मामले में जेल की सजा सुनाई गई। इंग्लैंड के साथ 2010 में चौथे टेस्ट मैच में इन तीनों खिलाड़ियों पर स्पॉट फिक्सिंग का आरोप लगा था। सलमान बट्ट टीम के पूर्व कप्तान भी रहे हैं। इन क्रिकेटरों को हालांकि अपनी सजा का केवल आधा समय ही जेल में बिताना पड़ सकता है क्योंकि अच्छा बर्ताव होने पर इन्हें लाइसेंस पर रिहा किया जा सकता है।

फिक्सिंग से पुराना है रिश्ता
जितना पुराना खेल है क्रिकेट, कुछ उतना ही पुराना मैच फिंक्सिंग का भी खेल है। इसमें पहला मामला तब आया था जब क्रिकेट उतना भी नहीं खेला जाता था। मगर क्रिकेट में फिक्सिंग की पहली घटना सबसे पहले 1817 से 1820 के आसपास नजर आई थी। उस समय विलियम लैंबार्ट नामक बल्लेबाज पर मैच फिक्सिंग के लिए प्रतिबंध लगाया गया था। हालांकि इसके बाद वह फिर कभी क्रिकेट नहीं खेल पाए। यह वह जमाना था जब सिंगल विकेट क्रिकेट खेली जाती थी और तब इस तरह के मैचों पर सट्टा लगाना आसान होता था।


इतिहासकार डेविड अंडरडाउन ने अपनी किताब स्टार्ट ऑफ प्ले क्रिकेट एंड कल्चर इन एटीन्थ सेंचुरीइंग्लैंड में लिखा है कि असल में सिंगल विकेट क्रिकेट में पूरे 11 खिलाड़ी नहीं होते थे और इसलिए उन्हें फिक्स करना आसान था। अंडरडाउन के अनुसार, 1817 में इंग्लैंड और नाटिंघम के बीच खेले गए मैच में कुछ खिला़ड़ियों ने जानबूझकर लचर प्रदर्शन किया था। इनमें विलियम लैंबार्ट भी शामिल थे जिन्हें उस समय का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज माना जाता था। लैंबार्ट के ही साथी फ्रेडरिक बियुक्लर्क ने इसकी शिकायत एमसीसी से की जिसने लैंबार्ट को लार्ड्स में खेलने से प्रतिबंधित कर दिया था।


इस तरह से लैंबार्ट दुनिया के पहले ऐसे क्रिकेटर थे जिन पर मैच फिक्सिंग के लिए प्रतिबंध लगा था। इंग्लैंड और नाटिंघम के बीच फिक्स हुए उस मैच के बारे में कहा जाता है कि दोनों टीमों के कुछ खिलाड़ियों ने जानबूझकर अपने विकेट गंवाए, कैच टपकाए और यहां तक कि ओवर-थ्रो से रन दिए।

अब जब खेल से ज्यादा पैसा अन्य स्रोत से भी आने लगे तो खिलाड़ी आसानी से इसके प्रति आकर्षित होते हैं। पहले क्रिकेटरों को ज्यादा विज्ञापन भी नहीं मिलता था, और अगर खिलाड़ी संपन्न परिवार से नहीं हो तो इस खेलमें आने की संभावना अधिक हो जाती थी। जो मैच फिक्सिंग की वजह बनता है। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान की जमीं सिर्फ इसी के लिए जानी जाती हो। यहां ऐसे दिग्गज खिलाड़ी भी हुए हैं जिसका लोहा आज भी दुनिया मानती है।

स्पॉट फिक्सिंगका खुलासा बंद हो चुके ब्रिटिश अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्डने अपने एक स्टिंग ऑपरेशन में किया था। बट, आमिर और आसिफ ने गत वर्ष अगस्त में लॉर्ड्स टेस्ट के दौरान जानबूझकर नो-बॉल करने के लिए बुकी मजहर मजीद से पैसे लिए थे। सटोरिए ने अदालत से कहा था कि इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा तेज गेंदबाज आसिफ को इसलिए दिया गया ताकि वह उसके प्रति वफादार रहे और पाकिस्तानी टीम के अंदर ही मौजूद एक दूसरे फिक्सिंग रैकेट की तरफ उसका झुकाव न हो सके।


भारत में स्थिति
इन हालातों के बीच भारत में लंबित पड़े 11 साल पुराने मैच फिक्सिंग मसले पर भी लोगों का ध्यान जाना लाजिमी है। दिल्ली पुलिस पिछले 11 सालों में मैच फिक्सिंग की गुत्थी नहीं सुलझा सकी है वहीं लंदन पुलिस ने महज 15 महीने के अल्प समय में क्रिकेट में भ्रष्टाचार फैला रहे खिलाड़ियों को सलाखों के पीछे भेज दिया। भारत के चार क्रिकेटर भी ऐसे ही फेर में फंसे थे, लेकिन आईसीसी ने उनपर प्रतिबंध लगाकर मामला रफा-दफा कर दिया। यह वही दिल्ली पुलिस है जिसे सबसे पहले फिक्सिंग का पता चला था।

साल 2000 में यह बात सामने आई थी कि पूर्व दक्षिण अफ्रीकी कप्तान हैंसी क्रोन्ये और उनके साथी खिलाड़ी निकी बोये और हर्शेल गिब्स मैच फिक्सिंग में लिप्त थे। साथ ही टीम इंडिया के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन, मनोज प्रभाकर, अजय जडेजा और अजय शर्मा पर भी संदेह व्यक्त किया गया था। लोग इस मामले को लगभग भूल चुके थे और खिलाड़ी भी निश्चिंत। पर अब लगता है कि यहां भी कुछ सुगबुगाहट शुरू हो जाएगी।

उल्लेखनीय है कि साल 2000 में दिल्ली पुलिस को एक कुख्यात बुकी और तत्कालीन दक्षिण अफ्रीकी कप्तान हैंसी क्रोन्ये के बीच हुई फोन पर बातचीत का रिकॉर्ड हाथ लगा था। इस रिकॉर्ड के मुताबिक क्रोन्ये ने मैच गंवाने के लिए पैसे कबूले थे। जांच में क्रोन्ये ने मैच फिक्सिंग के आरोप कबूल लिए थे। उन्होंने पाकिस्तान के सलीम मलिक और भारत के मोहम्मद अजहरुद्दीन व अजय जडेजा के नाम उजागर किए थे। उस समय जडेजा पर आईसीसी ने चार साल का प्रतिबंध लगाया था, जबकि सलीम मलिक और अजहर पर ताउम्र प्रतिबंध लगा दिया था।


भारत जैसे देश में यह खेल से कहीं अधिक लोगों की भावनाओं से जुड़ गया है। इसकी लोकप्रियता को देखकर तो अब यही लगता है कि अगर विश्व में इस जेंटनमैनके खेल को स्मार्ट और लोकलुभावन बनाए रखाना है व पाकिस्तान में क्रिकेट का भविष्य बचाना है, तो सरकार के साथ साथ बोर्ड और जिग्गज खिलाड़ियों को भी इसमें पहल करनी होगी।

पाकिस्तान में वैसे भी आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बंद है, खिलाड़ी खेल से ज्यादा ग्लैमर की तरफ झुक रहे हैं। यह घटना इसे और भी गंभीर बना सकता है, यानी ऐसा कहना पड़ सकता है कि पाकिस्तान में कोई पाक साफ खिलाड़ी तो है ना? और निश्चित हीं आने वाली पीढ़ी इससे प्रभावित होगी।