Sunday, 25 March 2012

दर्द दे गया, जैमी का जाना


मुझे नहीं पता कि भारत की शर्मनाक पराजय के लिए किसे दोषी माना जाए, पर जिस रतह से सीनियर खिलाड़ियों को निशाना बनाया गया वह न्यायोचित नहीं था।


जिस तरह गृहस्थी में पहले बचपन, युवा और व्यस्क के बाद वृद्धावस्था आता है कुछ उसी प्रकार क्रिकेटरों को भी अपने पेशेवर जीवन में कई रंग से रूबरू होना पड़ता है। मगर इसका पैमाना अलग है, 35 के राजनीति और 35 के क्रिकेटर होने में फर्क है। इस उम्र के पार भी लोग राजनीति के युवराज कहलाते हैं पर क्रिकेट में अलविदा युग या बूढ़े शेर कहलाने को मजबूर हो जाते हैं। दोनों के प्रदर्शन का प्रभाव समान जरूर है।

बातजैमीके जाने की यानी राहुल के रिटायरमेंट की हो रही है। द वॉलसुनने में जितना कठोर लगता है वास्तव में द्रविड़ उससे ज्यादा लचीले हैं। शायद ही कोई ऐसा खिलाड़ी हुआ हो जो क्रिकेट के सभी प्रारूप को शालीनता से खेलने में सक्षम रहा है। एक बेदाग क्रिकेट करियर से लेकर किसी फैसले को मानने वाले राहुल की कहानी सबसे जुदा है। टीम के कप्तान तथा प्रबंधन ने जब-जब उन्हें जहां कहीं भी बल्लेबाजी या किसी भी भूमिका के लिए कहा, उन्होंने ना नहीं कहा। इसी कारण उन्हें टीम मैनभी कहा जाता था। इसके अलावा द्रविड़ उन चंद खिलाड़ियों में भी थे जो किसी भी तरह का क्रिकेट खेल सकते हैं लेकिन प्राथमिकता टेस्ट क्रिकेट को ही दिया।

बतौर बल्लेबाज के रूप में उन्होंने एकदिवसीय क्रिकेट में करियर का पदार्पन किया, पर वो निकले टेस्ट क्रिकेट के कठोर बल्लेबाज। टीम जब कभी संकट में रही ज्यादातर मौके पर द्रविड़ ने नैया पार लगाया। उनके क्रीज पर रहते हुए खिलाड़ी निश्चिंत हो जाते थे कि अब तो फिलहाल विकेट नहीं गिरने वाला। इसी पर सुनील गावस्कर ने कहा, ‘मैदान के बाहर और अंदर अपने काम की गंभीरता के कारण वे युवा खिलाड़ियों के लिए आदर्श थे। ड्रेसिंग रूम में सचिन तेंदुलकर ने युवा खिलाड़ियों को प्रेरित किया, लेकिन ये खिलाड़ी जानते थे कि सचिन कुछ खास हैं, लेकिन वे राहुल द्रविड़ की ओर ऐसे देखते थे जैसे वे सभी द्रविड़ बन सकते हैं। राहुल हमेशा मेहनत करने वाले खिलाड़ी थे। उनके संन्यास से बड़ा शून्य पैदा हो गया है।

टीम इंडिया को ऑस्ट्रेलिया में मिली करारी हार की जिम्मेदारी चाहे जिस किसी की हो, पर ऐसा क्यों लगता है कि कीमत राहुल द्रविड़ ने चुकाई। व्यक्तिगत तौर पर किसी खिलाड़ी को दोष देना बेईमानी हो सकता है पर मैदान के अंदर और खेल के बाहर भी राहुल ऐसे शख्स है जिनकी सहनशीलता को सलाम करते हैं। सौरभ गांगुली, सचिन तेंदुलकर, सहवाग और युवराज सरीखे रिकॉर्डधारी बल्लेबाजों के बीच निरंतर प्रदर्शन करते रहना और पहचान बनाना ही बड़ी बात है। जब कभी उनके बल्ले से रन खामोश हुआ अपनी कलात्मक शैली और क्लासिकल शॉट्स के जरिए राहुल ने वापसी की। और वह भी रिकॉर्डतोड़ वापसी। आंकड़े गवाह हैं कि वो कितने सफल और शालीन खिलाड़ी रहे। किसी भी खिलाड़ी का घरेलू रिकॉर्ड सबसे बेहतर होता है, पर द्रविड़ शायद पहले भारतीय क्रिकेटर हैं जिनका विदेशों में प्रदर्शन घरेलू मैदान से बेहतर रहा है।


किसी भी खिलाड़ी से की जाने वाली तुलना में राहुल सचिन से भी कम नहीं रहे। खुद सचिन जैसा रिकॉर्डधारी भी इस बात से सहमत होगा। आंकड़े कहते हैं कि अपने 16 वर्षों के करियर में उन्होंने सचिन तेंदुलकर से ज्यादा रन बनाए। द्रविड़ ने 164 टेस्ट में 36 शतक और 63 अर्धशतक की मदद से 52.31 की औसत से 13288 रन बनाए जिसमें पकिस्तान के खिलाफ खेली उनकी 270 रन की सर्वश्रेष्ठ पारी भी शामिल है। वह तेंदुलकर के बाद टेस्ट क्रिकेट में सर्वाधिक रन बनाने वालों की सूची में दूसरे स्थान पर हैं। सौरव गांगुली की कप्तानी में खेले गए 21 टेस्ट जीतों में उन्होंने भारत के लिए 23 प्रतिशत रन बनाए और इन मैचों में उनका औसत 102.84 रहा। गांगुली के कप्तानी में जब भारत 2003 विश्व कप के फाइनल में पहुंचा तब उस दौरे पर उन्हें विकेट कीपर बनाया गया। सब गंगुली पर हैरान थे पर दलील भी समझ में आ गई, भारत को एक बल्लेबाज के साथ साथ एक नया कीपर मिल गया था। इससे पहले राहुल द्रविड़ ने 1999 विश्वकप में सर्वाधिक रन भी बनाया। वह 210 कैचों के साथ टेस्ट क्रिकेट के सबसे सफल क्षेत्ररक्षक हैं, जिसमें अधिकतर कैच स्लिप में लपके। इसके अलावा वनडे क्रिकेट में भी 196 कैच के साथ 14 स्टंप किए।

अब जैमीकी यह भोली सूरत मैदान पर भले नहीं दिखेगी पर क्रिकेट इतिहास के जेमजरूर बन गए हैं। मीडिया सहित अन्य हस्तियों ने इस पर अपने विचार प्रकट किए। अमिताभ बच्चन ने राहुल के संन्यास लेने पर उनकी भूमिका की सराहना की। अमिताभ ने लिखा, सबसे ज्यादा भरोसेमंद, जेंटिलमैन, निस्वार्थ भाव से खेलने वाले क्रिकेटर ने संन्यास लिया। वहीं शाहरुख खान ने कहा, राहुल द्रविड़ मेरे लिए सबसे जीवंत और भरोसेमंद क्रिकेटर हैं। टेनिस खिलाड़ी महेश भूपति ने लिखा, मैदान के अंदर और बाहर के चैम्पियन खिलाड़ी हैं राहुल। सचिन ने कहा, मैं उसे मिस करूंगा।
गांगुली की अपनी दलील है, राहुल के रिटायरमेंट पर कहते हैं कि कि द्रविड़ एक बेहतरीन बल्लेबाज ही नहीं, अच्छे विकेट कीपर और कप्तान भी थे। उनका फैसला सही वक्त पर आया। उनके संन्यास से खाली हुई जगह को भरना आसान नहीं होगा। द्रविड़ तीसरे नंबर पर खेलने वाले दुनिया के सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज थे।

पर शायद राहुल टीम प्रबंधन और क्रिकेट बोर्ड का भरोसा नहीं जीत पाए और खुद में खुश रहना बेहतर समझा। पिछले इंग्लैंड दौरे पर जब उन्हें अचानक चार साल बाद वनडे टीम में शामिल किया गया तो उस दौरे के पहले ही वनडे को अलविदा कह गए। अब जब वो कुछ टेस्ट पारियों में बोल्ड होने लगे तो सवालों के घेरे में आ गए। और वो शायद इसका जवाब भी अपने अंदाज में दे पाते, पर ऐसा लग रहा है कि सबकुछ समय से पहले हो गया। द्रविड़ ने अपनी एक कुर्सी खाली कर बहुतों के लिए अवसर खोल दिया पर क्या टीम इंडिया में दूसरा द वॉलखड़ा होगा? या क्रिकेट बोर्ड के पास उनके लायक कोई भूमिका है
(published in www.zeenews.com/hindi )

Monday, 6 February 2012

अगर टूटने से ‘सहारा’ मिले तो तोड़ दो करार



सहारा और टीम इंडिया। ये दोनों नाम भारत में खेल और लोगों की भावना से भामनात्मक और वास्तविकरूप से जुड़ा हुआ है। शायद इसी लिए सहारा ग्रुप के प्रमुख सुब्रत रॉय ने सार्वजनिक रूप से कहा कि भारतीय क्रिकेट टीम से इतने लंबे समय तक जुड़े रहने का कारण भावनात्मक लगाव था। खासकर भारत में क्रिकेट को बढ़ावा देना। लेकिन यहां का बोर्ड अब अमीरपतिबन गया है।

कुछ मायनों में वो सही कह रहे थे क्योंकि जिस समय सहारा ग्रुप भारतीय टीम से जुड़ी उस समय न तो बीसीसीआई विश्व की सबसे अधिकउगाहीवाली संस्था थी और ना ही क्रिकेट में इतना पैसा। इसी क्रम में खेलों की दुनिया में एक जाने पहचाने नाम- सहारा इंडिया ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, बीसीसीआई को करारा झटका देते हुए उसके साथ जारी लाखों डॉलर कीमत की स्पांसरशिप और इंडियन प्रीमियर लीग की पुणे फ्रेंचाइजी टीम से पिछले दिनों खुद को अलग करने का फैसला किया। सहारा की दलील है कि इतने लम्बे समय से क्रिकेट के साथ जुड़े रहने के बावजूद उसे एक बार फिर बीसीसीआई से उचित न्याय नहीं मिला है। सहारा का यह फैसला आईपीएल-5 की नीलामी के शुरू होने से कुछ समय पहले ही आया। इस नीलामी में 144 खिलाड़ियों की बोली लगनी थी लेकिन पुणे वारियर्स ने इस नीलामी में हिस्सा नहीं लिया।


वहीं बीसीसीआई ने कहा है कि उचित न्याय के बारे में सहारा की शिकायत दुर्भाग्यपूर्ण है और जहां तक पुणे फ्रेंचाइजी छोड़ने की बात है तो वह शर्तो के तहत ही इसमें कोई कदम उठा सकता है। कहने को तो ये शर्त है पर जोड़-तोड़ का खेल भी खुद बीसीसीआई ही करती है, क्योंकि इस अमीर क्रिकेट बोर्ड का किसी के प्रति जवाबदेही नहीं है और सरकार के प्रयास के बावजूद खुद को नियम कानून से दूर रखती है। यानी अपना नियम अपने हाथ!


सहारा को लोगो वाला भारतीय क्रिकेट टीम का नया जर्सी 2011 में आया था
सहारा का यह कहना कि एक प्रायोजक के रूप में 11 वर्षो की यात्रा के बाद वो निश्चित रूप से कह सकते हैं कि क्रिकेट अब बहुत धनवान हो चुका है, क्रिकेट की सहायता के लिए बहुत से धनी लोग मौजूद हैं। ऐसे में सहारा ग्रुप बहुत ही शांति के साथ बीसीसीआई की अधीनता वाले क्रिकेट से अलग हो सकता हैं और वो भारी मन के साथ इससे अलग हो रहे हैं। यह कथन ही बहुत कुछ बयां कर जाता है।



सहारा ग्रुप ने मई 2010 में भारतीय टीम के साथ अपने करार का नवीकरण किया था। इसके तहत उसे प्रत्येक मैच के लिए बीसीसीआई को 7,19,000 डॉलर देने होते हैं। यह करार दिसम्बर 2013 को समाप्त हो रहा था। इसके अलावा सहारा ने पुणे वारियर्स का मालिकाना हक हासिल करने के लिए बीसीसीआई को 37 करोड़ डॉलर दिए। सहारा ने बीसीसीआई से अनुरोध किया था कि वह युवराज सिंह की कीमत को चार फरवरी की नीलामी के लिए उपलब्ध राशि में जोड़ दे, जिससे कि वह बीमारी के कारण गैरहाजिर रहने वाले युवराज के स्थान पर किसी अन्य महत्वपूर्ण खिलाड़ी को अपने साथ जोड़ सके लेकिन बीसीसीआई ने उसकी इस मांग को ठुकरा दिया। सहारा ने यहां तक कहा था कि वह बीमारी से जूझ रहे युवराज को पूरी फीस देगा क्योंकि वह उसके लिए परिवार के सदस्य की तरह हैं। वहीं बीसीसीआई ने कहा कि वह खिलाड़ी के तौर पर युवराज का सम्मान करती है लेकिन जहां तक आईपीएल नियमों की बात है तो बीसीसीआई इसे साफ करने के लिए सहारा से बात करेगी।



वहीं आईपीएल अध्यक्ष राजीव शुक्ला ने कहा कि नीलामी के दिन सहारा का बोर्ड के साथ सम्बंध तोड़ने का फैसला बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। मगर ऐसा नहीं है कि बीसीसीआई कुछ भी महसूस नहीं कर रहा। वही भी सकते में है और भारतीय क्रिकेट को स्पांसरशिप न देने अथवा आईपीएल मुकाबलों में हिस्सा न लेने के सहारा के एकतरफा फैसले से किसी नकारात्मक आशंकाओं को दूर करने के लिए प्रयासरत है।

अब समय करार जारी रखने या मनाने का नहीं है क्योंकि कुछ मामलों में यह करार टूटना हितकर है। एक तो बीसीसीआई जैसी संस्था को अब टीम इंडिया की जर्सी पर लोगो लगाने के लिए किसी तरह के सहाराकी जरूरत नहीं। कई नामी कंपनियां कतार में खड़ी मिलेंगी और दूसरी तरफ सहारा ग्रुप के मुखिया ने कहा कि अब यह पैसा ग्रमीण प्रतिभा को उभारने में लगाएंगे। अन्य सामाजिक कार्यों में सहभागिता बढ़ाएंगे।

यानी क्रिकेट बोर्ड को और अमीर प्रायोजक मिलेगा, साथ हीसहाराके साथ अन्य खेलों को भी बढ़ावा मिल सकेगा। कुल मिलाकर क्रिकेट का नुकसान होकर औरों का भला हो सकेगा। बस इस करार के टूटने का इंतजार कीजिए। फिर किसी और को इस सहारा से भला हो तो क्यों न टूटे यह करार!

Saturday, 7 January 2012

क्यों लड़खड़ाती है भारतीय बल्लेबाजी?




1996 का समय याद कीजिए, भारतीय टीम में चोटी के बल्लेबाजों में सचिन तेंदुलकर, नवजोत सिद्धु, सौरभ गांगुली, मोहम्मद अजहरुद्दीन और राह पकड़ रहे राहुल द्रविड़ हुआ करते थे। ताबड़तोड़ रन जुटाने के लिए अजय जडेजा और रॉबिन सिंह की जोड़ी भी सामने आई। उस समय भी एक बात खास थी कि जब बल्लेबाजी का एक स्तंभ आउट हो जाता था तब पूरी टीम सस्ते में सिमट जाती थी। यानी तू चल, मैं आता हूं।

सौरभ गांगुली कप्तान बने और टीम को एकजुट होकर खेलना दिखाया। विदेशों में जीतने के साथ श्रृंखला पर कब्जा करने की आदत भी यहीं से शुरु हुई। हालांकि यह पहली बार नहीं हो रहा था। मगर गांगुली ने जो शुरु में किया उसे ही आज 'टीम इंडिया' कहा जाता है। उनसे पहले लोग ‘भारतीय क्रिकेट टीम’ को जानते थे और 'सब चला तो सब भला, एक चला तो भी भला' होता था।

यह कहानी टीम इंडिया के साथ लगभग सभी विदेशी दौरे की है। पिछले साल इंग्लैंड दौरे पर क्या हुआ, सब जानते हैं। 4-0 से हारने के बाद टेस्ट की बादशाहत गंवा दी टीम इंडिया ने, जो आज तक हासिल नहीं हुआ। अब जब भारतीय बल्लेबाज ऑस्ट्रेलिया के तेज पिचों और हवा के रुख से गेंदबाजों को मिलने वाली मदद से दो चार हो रहे हैं तो उन्हे एक-एक रन के लिए तरसना पड़ रहा है। भारत ने 2002-03 में ऑस्ट्रलिया के पड़ोसी न्यूजीलैंड में वनडे सीरीज 2-5 से गंवाई थी। भारतीय टीम जिन दो मैचों में सफल रही थी, उसमें भी मामूली अंतर से जीत मिली थी। 

यह पहली बार नहीं हुआ, जब भारतीय टीम को विदेशी पिचों पर जूझना पड़ा हो। टीम इंडिया के ऑस्ट्रेलिया के साथ अब तक खेले गए मैचों के प्रतिशत की बात की जाए तो केवल 24 फीसदी जीत भारत के खाते है, शेष में ऑस्ट्रेलिया विजयी रहा। ऑस्ट्रेलिया में मिली हार से साफ हो जाता है कि भारतीयों को यहां की धरती रास नहीं आई। भारतीय टीम फिर से यहां क्रिकेट खेलेगी तो उसे यहां की परिस्थितियां कमोबेश पहले जैसी ही मिलने वाली है। यहां बल्लेबाजी करना आसान नहीं है क्योंकि हवा चलने पर 130 किमी रफ्तार वाली गेंद 135 किमी की रफ्तार से आती है, जिससे बल्लेबाज का आकलन गड़बड़ा जाता है। इसमें अगर स्विंग करती गेंद पर चूक गए तो फिर मौका नहीं मिलता। ऐसा भारतीय गेंदबाजों के साथ भी होता है पर उसका फायदा बल्लेबाजी में उठाते नहीं बल्कि जूझते हैं। माना कि कंगारूओं को होम ग्राउंड का फायदा मिलता है पर वो बाहर भी ऐसा ही जौहर दिखाते हैं, जो भारतीय क्रिकेट में कम है।


अब बात दिग्गज बल्लेबाजी की करते हैं। टीम इंडिया की बल्लेबाजी कागज पर जितनी अच्छी लगती है, वो वास्तव में उससे ज्यादा अच्छी है। मगर सवाल उठता है कि आखिर कब तक पुरानी गाड़ी से बेहतर माइलेज लेते रहेंगे? सचिन पर शक नहीं, पर महाशतक ने सब महिमा मंडन कर रखा है। ‘अर्ध से शतक’ और महा... कब बनेगा, खुद सचिन भी कन्फ्यूज्ड होंगे। 21 पारी से इंतजार जारी है। राहुल तो ‘द वाल’ हैं, वनडे छोड़ चुके हैं पर टी-20 के कप्तान हैं (राजस्थान रॉयल्स)। मगर संयोग देखिए, वो खुद एक अनचाहे रिकॉर्ड की ओर बढ़ रहे हैं। द्रविड़ लगातार 52वीं बार क्लीन बोल्ड हुए जो टेस्ट क्रिकेट में एलन बार्डर के 53 मर्तबा आउट होने के विश्व रिकॉर्ड के एक कदम पीछे हैं वो कब विश्व रिकॉर्ड बना बैठेंगे, यह उनकी बल्लेबाजी बताएगी। गौतम गंभीर से जितनी उम्मीदें थी, सब गोल हो गया। सलामी बल्लेबाज के रूप में वो विदेशी पिचों पर बचते नजर आते हैं, अभी तक का ऑस्ट्रेलिया में उनका इतिहास यही कहता है। इस बार वीवीएस लक्ष्मण का ऑस्ट्रेलिया में एक भी स्पेशल पारी नहीं दिख रहा।


अभी द्रविड़-लक्ष्मण को मध्यक्रम का आधार माना जाता है

दरअसल स्विंग होती बॉल भारतीयों के लिए हमेशा से परेशानी का कारण रही है। इनस्विंग पर गति से मात खाना तो पुरानी आदत है, जो इस बार ऑस्ट्रेलिया दौरे में देखने को मिल रहा है। दूसरी बात टीम इंडिया के बेंच स्ट्रेंथ’ यानी रिजर्व में अतिरिक्त और युवा खिलाड़ियों का अभाव है, खासकर टेस्ट क्रिकेट में। विराट कोहली पिच पर टिक नहीं पाते, धोनी की शैली पर सिर्फ धुआंधार पारी की उम्मीद की जा सकती जो टेस्ट में अपवाद है। युवराज अब फिट नहीं रहते और टेस्ट में अपनी लंबी और जुझारू पारी नहीं दिखाते। वीरू की बात जुदा है, वो अपनी तरह खेलते हैं और कब फॉर्म में आएंगे, खुद नहीं जानते।

जिस दिन राहुल-सचिन-लक्ष्मण की तिकड़ी अलविदा होगी, उस दिन टेस्ट में टीम इंडिया के पास कौन सा तुरूप होगा, यह न क्रिकेट बोर्ड को पता है और न क्रिकेट प्रेमी इसका जवाब ढूंढ़ पाए हैं। जवाब चाहिए तो क्रिकेट ऑस्ट्रलिया की तरफ देखिए!