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Thursday, 17 January 2013

संस्कृतियों का भी अद्भुत संगम है महाकुंभ


इस बार के कुंभ मेले को महासंयोग के रूप में भी देखा जा रहा है। संगम के तट पर आस्था के इस सैलाब को तरह-तरह के नजरिए से देखा जाता है। घूमने-फिरने के शौकीन विदेशी मेहमानों की दिलचस्पी दखते ही बनता है।

आस्था के इस संगम मे सिर्फ हिन्दू और साधु ही नही, यहां अलग-अलग संस्‍कृति, परंपरा, परिवेश और भाषाओं के लोग आते हैं। देश के लगभर हर कोने से आए श्रद्धालुओं का जोश देखते ही बनता है। अगर आप उनके बीच खड़े है तो उनकी बोली भी वही भाव प्रकट करती है जिसे आप सुनने की चाहत रखते हैं- संगम में डुबकी लगाने और गंगाजल ले जाने की चाह।

एक सर्वे के अन्‍तर्गत  मीडिया के छात्र इसकी फोटोग्राफी, वीडियोग्राफी तो करेंगे साथ ही इससे जुड़े दस्‍तावेज भी तैयार किये जायेंगे। महाकुंभ में इस वर्ष दुनिया भर से लगभग 10 करोड़ से ज्यादा लोगों के आने का अनुमान लगाया जा रहा है। पहले दिन यानी मकर संक्रांति, 14 जनवरी को ही एक करोड़ से ज्यादा लोग संगम के तट पर आए। वैसे स्थानीय प्रशासन के इंतजाम तो पक्के हैं पर लोगों को संगम के तट पर जाने के लिए घुमावदार रास्ते और पानी के बदइंतजामी को नकारा नहीं जा सकता। वैसे भूले-भटके केंद्र की व्यवस्था को काफी सराहा जा रहा है। आईजी खुद खास दिनों पर कनून-व्यवस्था पर कैंप किए रहते है। पुलिस का भी मानना है कि व्यवस्था बनाए रखना एक चुनौती है। इलाहाबाद और कुंभ मेले के कमिश्‍नर आईएएस अधिकारी देवेश चतुर्वेदी का कहना है कि इस आयोजन की देखरेख करना, आम चुनाव की तरह ही चुनौतीपूर्ण हैं। यह प्रशासन के लिए बेहद मुश्किल काम है। इसे कैसे मैनेज किया जाता है। इसका अध्‍ययन करने के लिए देश के बड़े-बड़े संस्‍थानों से मैनेजमेंट गुरू भी आये हुए हैं।

मेले के विविध रंगों में आए साधु और बाबा आकर्षण का केंद्र है, कहीं चटपटिया बाबा हैं, कहीं एक डंडे से सब दु:ख दूर करने वाले महागौरी जी महाराज तो कहीं 40 वर्षों से जाग रहे फलाहारी बाबा। कुम्भ नगरी यूं तो 29 सेक्टरों में फैली हुई है, लेकिन इस धार्मिक मेले में दूर-दूर से आने वाले बाबाओं की ख्याति भी अब चारों ओर फैल रही है। इन बाबाओं की महिमा और साधना से यहां का माहौल आस्था और भजन के तरंगों से सराबोर है। खास श्रृंगार से सजे साधु और साध्वी भी खासे आकर्षित कर रहे हैं और यह बात यहां देखी भी जा सकती है। अगर महाकुंभ में नागा साधुओं की चर्चा न की जाए तो यह संगम ही अधूरा माना जाएगा। कहा जाता  है कि महाकुंभ में आने वाले नागा साधु महिलाओं से भी कहीं अधिक शृंगार करते हैं। महाकुम्भ के पहले शाही स्नान के दौरान नागा साधुओं के ये शृंगार वाकई में महिलाओं को भी मात देते नजर आए। पहले शाही स्नान के दौरान विभिन्न अखाड़ों के नागा साधुओं के विभिन्न रूप देखने को मिले। 17 से 18 तरह के श्रृंगार में सजे साधुओं को अगर आपने नहीं देखा तो यह यात्रा अधूरी है।

यहां आए भक्त और आस्था में सराबोर लोग नित्य क्रिया करने के बाद खुद को शुद्ध करने के लिए गंगा स्नान करते हैं, वहीं नागा सन्यासी शुद्धीकरण के बाद ही शाही स्नान के लिए निकलते हैं। महाकुम्भ पहुंचे नागा सन्यासियों की एक खासियत यह भी है कि इनका मन बच्चों के समान निर्मल होता है। ये अपने अखाड़ों में हमेशा धमा-चौकड़ी मचाते रहते हैं। इनका मठ इनकी अठखेलियों से गूंजता रहता है। अखाड़ों की बात करें तो महानिर्वाणी, जूना और निरंजनी अखाड़ों में सबसे अधिक नागा साधुओं की तादाद है। यकीन मानिए लोगों में चर्चा और कौतुहल बनाए इन नागा साधुओं को जब आप देखेंगे तो उनके जोश और उत्साह के आगे आप और कुछ सोच भी नहीं पाएंगे, देखने की बात तो दूर है। नागा तो बस नाम है, काम और उस जीवन को जीना अत्यंत कठिन है और यही उनके साधना व समर्पण का सार है।


सच कहूं तो संगम पर आए इस सैलाब को देखना और व्यक्त करना मुमकिन नहीं क्योंकि अगर आप इसे जीवंत देखना चाहते हैं तो न टीवी, न कहानी और ना ही रिपोर्ट देखिए क्योंकि दुनिया में इतना बड़ा जन सैलाब कहीं और नहीं मिलता। कुम्भ को देखने से ज्यादा महसूस करने की कोशिश कीजिएगा
!