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Monday, 5 December 2011

भ्रष्टाचार को आड़, एफडीआई पर वार

जब अन्ना हजारे ने अगस्त में जनलोकपाल के लिए आंदोलन कर रामलीला मैदान में अपना अनशन खत्म किया, उस समय केंद्र सरकार ने यह भरोसा दिलाया कि संसद के आने वाले शीतकालीन सत्र में इस बिल को पारित कर भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून बनाया जाएगा। अन्ना की भी यही मांग थी और लोगों को इसी का इंतजार था कि आखिर इस आंदोलन का अंजाम भ्रष्टाचार का रोकथाम होगा या नहीं।

अब शीतकालीन सत्र भी शुरु हो गया है लेकिन दो सप्ताह बाद भी लोकपाल बिल की चर्चा तक नहीं हुई है। सरकार भी खुश है कि मीडिया, जनता और विपक्ष का ध्यान एक नए मुद्दे की तरफ आकर्षित हुआ। इसे सरकार की चालाकी कहें या कमजोरी- जनलोकपाल, भ्रष्टाचार, संचार घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल धांधली तथा भूमि विवाद जैसे मुद्दों को दबाने के लिए एफडीआई को अचानक से चर्चा का विषय बना दिया। कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आड़ लेने के लिए सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का नया झुंझुना सबके हाथ थमा दिया। नतीजा आपके सामने है, सब एफडीआई… कर रहे हैं।

याद कीजिए पिछले दिनों यात्राओं का दौर निकल पड़ा था। 11 अक्तूबर को आडवाणी ने अपनी छठी राजनीतिक यात्रा जन चेतना की शुरुआत जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताबदियारा (बिहार) से की। योग गुरु बाबा रामदेव ने अपनी 10 हजार किलोमीटर की भारत स्वाभिमान यात्रा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि से 20 सितंबर से शुरू की। आगामी यूपी चुनाव में जीत के इरादे को आधार देने के लिए सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बसपा के खिलाफ क्रांति रथयात्रा निकाली। रही सही कसर राहुल गांधी ने पूरी की। कांग्रेस के राजा बनने को तैयार राहुल की चुनावी व व्यापक जन संपर्क यात्रा भी यूपी से शुरु हुई। इसके अलावा उपवास, व्रत और धरना अलग है, जो अन्ना और अन्य राजनेता कर रहे या कर चुके। ये सब धरे के धरे रह गए और आ गया एफडीआई।  


इस बीच संसद के शीतकालीन सत्र पर हम सब सांसद और सदन की कार्रवाही पर जैसे ही नजर डालते थे, आशा करते कि कुछ तो चर्चा देखने मिले, पर सभापति दो मिनट में पहले सदस्यों को शांत कराते और दूसरे क्षण परेशान होकर सदन स्थगित कर देते। मजेदार बात तो यह कि इधर संसद बाधित होती थी और उधर राहुल गांधी ‘लाईव’ हो जाते थे। युवक कांग्रेस सम्मेलन ‘बुनियाद’ तो बार-बार ब्रेकिंग बनता रहा।

संसद के शीतकालीन सत्र में पहले तीन दिन तक यूपी बंटवारा, पी चिदंबरम का मुद्दा हंगामा बरपाता रहा। सरकार भी संकट मोल नहीं लेना चाह रही। साथ ही सरकार को यह भी डर सता रह है कि अगर संसद में सब कुछ सुचारू रूप से चलता रहा तो कालेधन और संचार घोटाले के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर भी विपक्ष उसे घेरेगा, जिसपर कहीं न कहीं सरकार तत्काल कमजोर नजर आ रही है। सरकार की तरफ से सबसे बड़े संकट मोचकों में से एक पी चिदंबरम का 2-जी आवंटन घोटाला में नाम अना भी सरकार के लिए एक परेशानी है।

अगर गौर से देखा जाए तो विपक्ष की यह मांग अवसरवादी नजर आता है। यह सही है कि पी चिदंबरम का नाम 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आ चुका है, लेकिन संदेह के बादल एनडीए सरकार तक फैले हुए हैं। शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर उछालते रहें तो रोजाना टूटने की आवाजें आएंगी ही।

बार-बार सत्र के बाधित होने और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा न होने से देश का कितना नुकसान होता है, यह हमारे सांसद बेहतर समझते हैं, जनता जो भुगतती है, सो अलग। इस बार बाधा पहुंचाने के मुद्दों में गृहमंत्री का बहिष्कार भी शामिल हो गया है। विपक्ष की मांग है कि गृहमंत्री पी चिदंबरम 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में बराबर के दोषी हैं, इसलिए उन्हें इस्तीफा देना चाहिए।


राजनीतिक शुचिता बनाए रखना हो तो कोई भी गंदगी नहीं रहनी चाहिए। भ्रष्टाचार पर मंत्री और सरकार के चरित्र की बात करने वाला विपक्ष इस बात को अच्छी तरह समझता है। लेकिन उसका मकसद किसी न किसी प्रकार सरकार को परेशानी में डालना है,  इसलिए शीतकालीन सत्र के पहले यह तय कर लिया गया कि पी चिदंबरम का इस्तीफा मांगा जाए। दूसरी ओर केंद्र सरकार की नीयत भी कोई पाक साफ नहीं है। हंगामे के बीच सरकार शीतकालीन सत्र पूरा कर लेगी और देश हित के जरूरी मुद्दे पीछे छूट जाएंगे।

जन प्रतिनिधियों को तो संसद में बैठकर नियम बनाना और कुछ महत्वपूर्ण फैसले लेने होते है, पर लगता नहीं कि वो इस पर गंभीर हैं। संसद में 31 से ज्यादा बिल लंबित है, कुछ जरूरी बिल जिस पर लोगों के साथ–साथ विशेषज्ञों की भी नजर है उनमें-
·         व्हिसल ब्लोअर विधेयक पेश किया जाना है, जिसमें किसी सरकारी मुलाजिम द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग करने या भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत किए जाने और शिकायतकर्ता को सुरक्षा दिए जाने का प्रावधान है।
·         राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक है, जिसमें गरीब जनता को न्यूनतम मूल्य पर भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
·         भूमि अधिग्रहण विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर मौजूदा सत्र में चर्चा होनी थी और इनके पारित होने पर फैसला होना बाकी है।
·         जन लोकपाल तो पहले ही शीतकालीन सत्र में पास कराने की सरकार की बाध्यता बनी हुई है। इस मुद्दे पर अन्ना के आंदोलन को कौन भूल सकता है।


अब सवाल यह है कि क्या यह मसला मीडिया के प्राइम टाइम मसाले और राजनेताओं के बैठक और विरोध तक सामित रह जाएगा या सरकार इसे मकाम पर पहुंचाएगी? रीटेल क्षेत्र में एफडीआई को सरकार महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक विकास और लोगों के हित से जोड़कर दिखा रही है, मगर आम जनता को रीटेल स्टोर के एफडीआई और मेगा स्टोर पर जाने की कितनी फिक्र है, यह हम आप अच्छी तरह जानते हैं। यह न तो शाइनिंग इंडिया है, न भारत उदय है और न ही भारत निर्माण। 
www.zeenews.india.com/hindi/news/category/ज़ी-स्पेशल में प्रकाशित

Sunday, 11 September 2011

कैसे कहें कि दिल्ली 'वर्ल्ड क्लास' है ?


दिल्ली हाईकोर्ट में हुए बम विस्फोट ने यह साबित कर दिया कि जानकारी और चौकस रहने के बावजूद हम हमले नहीं रोक सकते. बस ऊपर वाले से दुआ करते रहें कि हम पर कोई मुसीबत नहीं आए, सरकार से फ़रियाद करना बेईमानी है. जनता सह रही है और सरकार खामोश रहती है. शायद  कोई  मसीहा  आकर  हमारी रक्षा करेगा.

खैर छोड़िये इन बातों को, सरकार सिर्फ बहाने बना सकती है और विपक्ष आरोप. फिर भी जो मंजर दिल्ली हाई कोर्ट विस्फोट के बाद देखने को मिला उससे यह साफ़ जाहिर हो रहा था कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए दिल्ली तैयार नहीं है. आध दर्जन से ज्यादा मौत तो आपात सुविधा न रहने के कारण हो गया. वहां पर मौजूद लोग कह रहे थे कि अगर एम्बुलेंस की सुविधा उपल ब्ध होती तो कुछ और जानें बचाई जा सकती थी. जो एम्बुलेंस मौजूद थे उसमे जरूरी जीवन रक्षक उपक्रम भी नहीं लगे थे. अगर कुछ में भी ऐसी सुविधा रहती तो घायलों को फौरन ये सुविधा दी जा सकती थी. ये हाल संसद भवन और राष्ट्रपति भवन के दो किलोमीटर दायरे का है.

सबसे नजदीकी अस्पताल राममनोहर लोहिया भी केंद्र सरकार के बड़े अस्पतालों में से एक है जहां अधिकतर घायलों को भर्ती कराया गया. वहां क्या हालत थे ये किसी से छुपा नहीं है. घायलों को यहां तक लाने में दो घंटे का समय लगा. कुछ घायलों ने तो रस्ते में ही दम तोड़ दिया था क्योंकि समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पायी.

राष्ट्रमंडल खेलों के समय दिल्ली को चमकाने की मुहिम चली वो भी अब मुंह चिढ़ाती है. बड़ी- बड़ी बसें चलीं, चौड़े सड़क बनाए गए, तेज यातायात के लिए उपरी पूल बने, यहां तक कि सौ से ज्यादा आधुनिक एम्बुलेंस ख़रीदे गए. मगर दुर्भाग्य देखिये कि ज्यादातर एम्बुलेंस धूल फांक रहे हैं. ऐसे आयोजन के लिए हजारों करोड़ रुपये फूंक दिए गए लेकिन आपात चिकित्सा सुविधा की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा. अगर ये हाल देश की राजधानी दिल्ली का है तो अन्य जगह की बात बेईमानी होगी. 
  
राम मनोहर लोहिया अस्पताल में खून संग्रह केंद्र भी है, यानि ब्लड बैंक की सुविधा मौजूद है, लेकिन संयोग देखिये कि धमाकों के बाद सबसे ज्यादा खून की कमी यहीं पर रही. लोग अपने ही हाथों एक दूसरे और अनजानों की सहायता कर रहे थे.

सरकार की सुविधा बिलकुल सरकारी बनी हुई थी, सब कुछ देरी से. हालत तो तब बदतर हो गए जब डाक्टरों की जगह वार्ड ब्यॉय मरीजो को प्लास्टर लगा रहे थे. पूरे अस्पताल में अव्यवस्था फैली हुई थी वो भी ऐसे आपात घड़ी में. मिनी आपरेशन थिएटर पूरे दिन खून से रंगा लग रहा था. कोई भी समुचित व्यवस्था कहीं नहीं दिख रही थी. जानकारी के आभाव में परिजन इधर- उधर भटक रहे थे.

असल में आम आदमी की कीमत कितनी आम है ये सरकार ने दिखा दिया. बगल में संसद भवन और सांसदों की सुरक्षा में करोड़ों रुपये बस कुछ घंटों में खर्च हो जाते हैं पर घायल मरीजों के लिए इतनी सी सुविधा नहीं मिल पाती कि वो अपनी जान बचा सकें.

बात इतनी पर ख़त्म हो जाती तो फिर भी समझा जा सकता था. राममनोहर लोहिया अस्पताल में दो दिन बाद के हालात देखिये, जो मरीज पूरी तरह ठीक भी नहीं हुए थे उन्हें अपने घर लौटने को कह दिया गया. जैसे कुछ लोगों को एक्स-रे रिपोर्ट में कील और छर्रे आने के बाद भी  दवा  दे  कर कह दिया गया कि वो वापस घर जाएं, दवा खाने पर छर्रे निकल जाएगा. कुछ मरीजों और  परिजनों ने तो डाक्टरों के व्यवहार भी शिकायत की और कहा कि उनका बर्ताव अच्छा नहीं था. कुछ भी पूछने पर डांट देते थे. परा मेडिकल स्टाफ खोजने पर भी नहीं मिल रहे थे.
   
अपनों को खोजने आए परिजनों की बदकिस्मती देखिये कि शाम तक पीड़ितों की सूची तक जारी नहीं की गयी थी. इनकी मदद के लिए न तो प्रशासन कुछ कर रहा था न ही दिल्ली पुलिस आगे आ रही थी. वहीं नेताओं और मत्रियों की सुरक्षा में अस्पताल और पुलिस ज्यादा तत्पर दिखी. ऐसे में अस्पताल आये राहुल गांधी सरीखे नेताओं के खिलाफ परिजन अगर नारे लगते हैं तो क्या गलत है? वैसे भी जनता आजकल नेताओं से ज्यादा गुस्साई हुई है.  
इससे पहले मरीजो को खाने के लिए जो खाना दिया गया वह भी साफ़ नहीं था. कुछ खानों में तो फंगस लगे होने तक की शिकायत की गई. अगर राजधानी में अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं का यही हाल रहा तो हमारे योजना आयोग के उपाध्यक्ष जीडीपी का जितना प्रतिशत भी इसमें लगा दें, लाभ जरूरतमंद आम लोगों तक नहीं पहुंच पाएगा. वैसे भी अमीर लोग महंगे अस्पतालों में ही इलाज करवाते है.

तो हमारी राजधानी दिल्ली कब वर्ल्ड क्लास बनेगी यह आम लोग तो नहीं समझ पाएं, लेकिन करोड़ों रुपये खर्च करके हमारे रहनुमा वाहवाही जरूर लूट लेते है. भले ही तंत्र सही काम करे या नहीं. आखिर कैसे और कब बनेंगे हम विश्वस्तरीय?