Sunday, 11 September 2011

कैसे कहें कि दिल्ली 'वर्ल्ड क्लास' है ?


दिल्ली हाईकोर्ट में हुए बम विस्फोट ने यह साबित कर दिया कि जानकारी और चौकस रहने के बावजूद हम हमले नहीं रोक सकते. बस ऊपर वाले से दुआ करते रहें कि हम पर कोई मुसीबत नहीं आए, सरकार से फ़रियाद करना बेईमानी है. जनता सह रही है और सरकार खामोश रहती है. शायद  कोई  मसीहा  आकर  हमारी रक्षा करेगा.

खैर छोड़िये इन बातों कोसरकार सिर्फ बहाने बना सकती है और विपक्ष आरोप. फिर भी जो मंजर दिल्ली हाई कोर्ट विस्फोट के बाद देखने को मिला उससे यह साफ़ जाहिर हो रहा था कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए दिल्ली तैयार नहीं है. आध दर्जन से ज्यादा मौत तो आपात सुविधा  रहने के कारण हो गया. वहां पर मौजूद लोग कह रहे थे कि अगर एम्बुलेंस की सुविधा उपल ब्ध होती तो कुछ और जानें बचाई जा सकती थी. जो एम्बुलेंस मौजूद थे उसमे जरूरी जीवन रक्षक उपक्रम भी नहीं लगे थे. अगर कुछ में भी ऐसी सुविधा रहती तो घायलों को फौरन ये सुविधा दी जा सकती थी. ये हाल संसद भवन और राष्ट्रपति भवन के दो किलोमीटर दायरे का है.

सबसे नजदीकी अस्पताल राममनोहर लोहिया भी केंद्र सरकार के बड़े अस्पतालों में से एक है जहां अधिकतर घायलों को भर्ती कराया गया. वहां क्या हालत थे ये किसी से छुपा नहीं है. घायलों को यहां तक लाने में दो घंटे का समय लगा. कुछ घायलों ने तो रस्ते में ही दम तोड़ दिया था क्योंकि समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पायी.

राष्ट्रमंडल खेलों के समय दिल्ली को चमकाने की मुहिम चली वो भी अब मुंह चिढ़ाती है. बड़ी- बड़ी बसें चलींचौड़े सड़क बनाए गएतेज यातायात के लिए उपरी पूल बनेयहां तक कि सौ से ज्यादा आधुनिक एम्बुलेंस ख़रीदे गए. मगर दुर्भाग्य देखिये कि ज्यादातर एम्बुलेंस धूल फांक रहे हैं. ऐसे आयोजन के लिए हजारों करोड़ रुपये फूंक दिए गए लेकिन आपात चिकित्सा सुविधा की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा. अगर ये हाल देश की राजधानी दिल्ली का है तो अन्य जगह की बात बेईमानी होगी. 
  
राम मनोहर लोहिया अस्पताल में खून संग्रह केंद्र भी हैयानि ब्लड बैंक की सुविधा मौजूद है, लेकिन संयोग देखिये कि धमाकों के बाद सबसे ज्यादा खून की कमी यहीं पर रही. लोग अपने ही हाथों एक दूसरे और अनजानों की सहायता कर रहे थे.

सरकार की सुविधा बिलकुल सरकारी बनी हुई थीसब कुछ देरी से. हालत तो तब बदतर हो गए जब डाक्टरों की जगह वार्ड ब्यॉय मरीजो को प्लास्टर लगा रहे थे. पूरे अस्पताल में अव्यवस्था फैली हुई थी वो भी ऐसे आपात घड़ी में. मिनी आपरेशन थिएटर पूरे दिन खून से रंगा लग रहा था. कोई भी समुचित व्यवस्था कहीं नहीं दिख रही थी. जानकारी के आभाव में परिजन इधर- उधर भटक रहे थे.

असल में आम आदमी की कीमत कितनी आम है ये सरकार ने दिखा दिया. बगल में संसद भवन और सांसदों की सुरक्षा में करोड़ों रुपये बस कुछ घंटों में खर्च हो जाते हैं पर घायल मरीजों के लिए इतनी सी सुविधा नहीं मिल पाती कि वो अपनी जान बचा सकें.

बात इतनी पर ख़त्म हो जाती तो फिर भी समझा जा सकता था. राममनोहर लोहिया अस्पताल में दो दिन बाद के हालात देखिये, जो मरीज पूरी तरह ठीक भी नहीं हुए थे उन्हें अपने घर लौटने को कह दिया गया. जैसे कुछ लोगों को एक्स-रे रिपोर्ट में कील और छर्रे आने के बाद भी  दवा  दे  कर कह दिया गया कि वो वापस घर जाएंदवा खाने पर छर्रे निकल जाएगा. कुछ मरीजों और  परिजनों ने तो डाक्टरों के व्यवहार भी शिकायत की और कहा कि उनका बर्ताव अच्छा नहीं था. कुछ भी पूछने पर डांट देते थे. परा मेडिकल स्टाफ खोजने पर भी नहीं मिल रहे थे.
   
अपनों को खोजने आए परिजनों की बदकिस्मती देखिये कि शाम तक पीड़ितों की सूची तक जारी नहीं की गयी थी. इनकी मदद के लिए  तो प्रशासन कुछ कर रहा था न ही दिल्ली पुलिस आगे  रही थी. वहीं नेताओं और मत्रियों की सुरक्षा में अस्पताल और पुलिस ज्यादा तत्पर दिखी. ऐसे में अस्पताल आये राहुल गांधी सरीखे नेताओं के खिलाफ परिजन अगर नारे लगते हैं तो क्या गलत है? वैसे भी जनता आजकल नेताओं से ज्यादा गुस्साई हुई है.  
इससे पहले मरीजो को खाने के लिए जो खाना दिया गया वह भी साफ़ नहीं था. कुछ खानों में तो फंगस लगे होने तक की शिकायत की गई. अगर राजधानी में अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं का यही हाल रहा तो हमारे योजना आयोग के उपाध्यक्ष जीडीपी का जितना प्रतिशत भी इसमें लगा देंलाभ जरूरतमंद आम लोगों तक नहीं पहुंच पाएगा. वैसे भी अमीर लोग महंगे अस्पतालों में ही इलाज करवाते है.

तो हमारी राजधानी दिल्ली कब वर्ल्ड क्लास बनेगी यह आम लोग तो नहीं समझ पाएं, लेकिन करोड़ों रुपये खर्च करके हमारे रहनुमा वाहवाही जरूर लूट लेते है. भले ही तंत्र सही काम करे या नहीं. आखिर कैसे और कब बनेंगे हम विश्वस्तरीय?

Saturday, 27 August 2011

घाटे में 'राष्ट्रीय संपदा'


 सीएजी की रिपोर्ट भारतीय रेल पर भी सवाल उठा गया. आरक्षण प्रणाली से लेकर तत्काल और अग्रिम आरक्षण सुविधा की जांच करने पर पाया कि जिन आम जरूरतमंद यात्रियों की सुविधाके लिए यह सेवा बनी है वो घोटालेबाजी के कारण इसका पूरा लाभ नहीं ले पाते.
कंप्यूटरीकृत आरक्षण प्रणाली की चर्चा इसलिए क्योंकि वर्तमान में लोगों को रेलवे से अगर कोई बड़ी शिकायत है, तो वह टिकट खिड़की से ज्यादा कुछ भी नहीं. लेट लतीफी तो फिर भी सह लेंगे मगर जब टिकट ही नहीं मिले तो यात्रा क्या ख़ाक करेंगे?

मजबूर होकर लोग दलाल की शरण में जाते हैं. सरकार की दलील है कि सारा काम पारदर्शी है. मगर जांच में पाया गया कि टिकट खिड़की खुलने के चंद ही मिनटों में तत्काल कोटे की सभी टिकटें खत्म हो जाती हैं. गौरतलब है कि रोजाना लाखों लोग रेलवे की इंटरनेट आरक्षण सुविधा के जरिए टिकट आरक्षित कराते हैं. यात्री इस गड़बड़ी में रेलवे कर्मचारियों और दलालों की मिलीभगत की लंबे समय से शिकायत कर रहे हैं. शिकायत होती है पर सुनवाई कोई नहीं करता. मगर यह पहली बार हुआ है कि किसी राष्ट्रीय एजेंसी ने इस शिकायत पर मुहर लगाई है.

कुछ महीने पहले एक विकल्प के रूप में रेलवे का नया वेब पोर्टल आया, जिसका भट्टा बैठ चुका है और अब यह बंद पड़ा है. कब दुरुस्त होगा कोई नहीं कह रहा.

पिछले आठ साल से यात्री किराए में कोई इजाफा नहीं किया गया है, पर ऐसा नहीं है कि आपकी यात्रा सस्ती हुई है. आरक्षण और सरचार्ज के नाम पर कई अतिरिक्त कर लगा दिए गए. हां, दैनिक यात्रियों को थोड़ी राहत जरूर दी गयी. सुविधा तो बढ़ी नहीं और रफ्तार यथावत है. ट्रेनें घंटों लेट चलती हैं.

आईआरसीटीसी से खानपान का ठेका छिनने के बाद भी ट्रेनों में और रेलवे स्टेशनों पर मिलने वाले खाने में कोई सुधार नहीं हुआ है. इसके उलट मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के पेंट्रीकार से मिलने वाली थाली महंगी हो गयी. 35 रूपये में मिलने वाला साधारण खाना कब 65 का हो गया पता भी नहीं चला. स्पेशल की तो बात ही छोड़ दें. हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी कीमत 30 रुपया ही बताया गया.
राजधानी जैसी वीआइपी गाड़ी में भी खाना वीआइपीनहीं रहा, बिलकुल सामान्य सी थाली दी जाती है इस ट्रेन में! खाने की पैकिंग जरूर अच्छी रहती है, जिसका फंडाआप समझ सकते हैं.
उधर स्टेशन पर आम लोगों के लिए शुरू किया गया जन आहारभी स्टॉल से नदारद है. रेलवे की बोतल बंद पानी रेल नीर12 रू में बाजार में सबसे सस्ती जरूर है.

संसद में पेश सीएजी ने अपनी इस रिपोर्ट में रेलवे के वित्तीय घाटे का भी आंकलन किया है. इसका बोझ अब एसी में सफर करने वाले यात्रियों पर डाला जाना है. माल भाड़े में भी वृद्धि की बात की जा रही है.

दुर्घटनाओं की बात की जाए तो इसकी सूची और भी लंबी है. पिछले पांच साल में जितनी नई रेलगाड़ियां चलीं हैं उस अनुपात में रेल दुर्घटना अधिक हुई है. कारण यह कि ट्रेनें बढ़ी, ट्रैक नहीं बढ़ाए गए. कई महत्वपूर्ण पद अभी भी खाली पड़े हैं. दो महीने पहले तक रेलवे बोर्ड का कोई चेयरमैन तक नहीं था. भर्तियां नदारद है और तकनीक पुरानी हो चुकी है. आलम यह है कि हम अभी भी अंग्रेजों के जमाने वाले सिग्नल प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं.   
यह एक  अलग सच्चाई  है कि भारतीय रेल दुनिया की सबसे ज्यादा कर्मचारी वाला अकेला संगठन है. इसमें लगभग 16 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं.

पुरानी हो चुकी सिग्नलिंग सिस्टम और उससे भी ज्यादा बोझ सह रही पटरियां कब साथ छोड़ देगी यह खुद रेलवे वाले भी नहीं जानते. एक खबर के अनुसार कानपुर के पास मगरवारा और गंगा पुल के बीच एक चटकी हुई पटरी से 18 ट्रेनें गुजार गयी और किसी को भनक तक नहीं लगी.
सुरक्षा के नाम पर रेलवे के पास आरपीएफ, यानी रेल सुरक्षा बल है. यह कहता है- रेलवे सम्पति, यात्री क्षेत्र तथा यात्री की सुरक्षा एवं बचाव, रेलवे के आवागमन या यात्री क्षेत्र में किसी बाधा को हटाना तथा रेलवे सम्पति, यात्री क्षेत्र एवं यात्रियों के बेहतर सुरक्षा एवं बचाव के लिए तत्पर !
हकीकत यह है कि आप किसी आम स्टेशन, एक्सप्रेस या मेल रेलगाड़ी में यदा- कदा हीं पूरी सुरक्षा व्यवस्था पाऐंगे. कारण यह भी है कि राज्य बदलने के साथ रेलवे पुलिस भी बदल जाती है. हालांकि नए रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने संसद में कहा कि रेलवे में जल्द ही एकीकृत सुरक्षा प्रणाली शुरू की जाएगी.

आंकड़ों के अनुसार विभिन्न राज्यों की जीआरपी रोजाना 2,200 गाडि़यों में और रेलवे सुरक्षा बल हर दिन औसतन 1,275 गाड़ियों में यात्रियों की सुरक्षा करते हैं. लेकिन हर महीने चोरी और लूट की इतनी घटनाएं भी होती हैं जो दर्ज ही नहीं हो पाती. जबकि रोजाना 7,000 यात्री गाड़ी चलती है.
ऐसा नहीं है कि इस पर किसी की नजर नही जाती, संसद में सलाना रेल बजट पेश होता है और रेलमंत्री समाधान के साथ- साथ परियोजनाओं की घोषणा भी करते हैं. मगर कुछ ही अमल में आता हैं, बाकी सब फाइलों तक सीमित रह जाता है या फिर धीरे- धीरे दशकों बाद पूरा होता है. वो भी राजनीतिक नफे- नुकसान के बाद.
अब बुलेट ट्रेन चलाने की बात की जा रही है जिसकी औसत रफ्तार 300 किलोमीटर प्रति घंटा होती है. हमारे देश की सबसे तेज ट्रेन शताब्दी एक्सप्रेस 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है, वह भी चुनिंदा रूटों पर.
इंडियन रेलवे कंस्ट्रक्शन कम्पनी, जिसे दिल्ली- आगरा- लखनऊ- वाराणसी-पटना के बीच हाई स्पीड रेलगाड़ी के लिये रेल रूट बनाना है, 993 किलोमीटर लम्बे कॉरिडोर के लिये अपनी रिपोर्ट चालू वर्ष के अंत तक सौंपेगी. देखते हैं यह सपनाकब पूरा होता है क्योंकि खर्च 70 करोड़ प्रति किलोमीटर है.

फिलहाल कुव्यवस्था और शिकायतों से घिरी भारतीय रेल यात्रियों को सही सेवा देने में असमर्थ दिख रही है. शायद यह भी एक कारण है कि कभी करोड़ों उगाही करने वाली हमारी राष्ट्रीय संपदाघाटे में चल रही है. सरकार मौन है, यात्री मजबूर.

Monday, 21 February 2011

सफर में चलते हुए..

मुसाफिर हूँ यारों , न घर है ना ठिकाना.... कुछ यूँ ही गीत गाते हुए सुना डी टी सी  के बस में लोगों और कर्मचारियों के द्वारा ... बस जा रही थी दिल्ली के आसपास शहरी इलाकों में. देवली गाँव से होते हुए नयी दिल्ली की भीड़ में शायद गुम होते हुए डी टी सी की आवाज़ के साथ -साथ ये गीत भी खोता जा रहा है. गीत से ज्यादा लोगों की आवाज़ भी दबती लग रही है. एक दूसरे को ना जानते हुए भी अनजाना नहीं बनते लोग, कुछ मुस्कुराते हुए, कुछ झुन्झुलाते हुए सबकी अपनी "फीलिंग" दिखती है इन बसों में. इसे अंग्रेजी की 'फिल' नहीं समझें, इन्सान इन्सान से अलग हो कर भी एक आम ढांचा दिखता है इस सफ़र में. पूरे हिंदुस्तान की विविधता चमकती है यहाँ, क्योकि मिनी भारत है दिल्ली में... दिल्ली परिवहन निगम के साथ.

Saturday, 19 February 2011

कहते रहो..

ब्लाग्स के बारे में सुना कि ये मन की बात कहने का ज़रिया है। आगे सीखता रहूंगा....