Tuesday, 27 December 2011

‘कद’ से भी बड़ा हुआ बीसीसीआई


बीसीसीआई ने क्रिकेट की दुनिया में आज जो मकाम हासिल किया है, वैसा हर कोई अपनी जिंदगी में पाने की इच्छा रखता है। एक समय था जब भारत में क्रिकेट की इस संचालक संस्थआ को कोई जानता तक नहीं था। आज सालाना 100 मिलिन डॉलर की कमाई करता है बीसीसीआई। यानी दुनिया में क्रिकेट का सबसे अमीर बोर्ड।


दशकों पहले सिर्फ नाम की संस्था थी बीसीसीआई और सरकार के रहमो करम पर चलता था बीसीसीआई। लेकिन आज हालात क्या है यह किसी से छिपा नहीं है। शायद यही कारण है कि आज जब सरकार इस पर लगाम लगाने की कोशिश कर रही है, तो उल्टे जवाब देकर सरकार को चुप करा देती है बीसीसीआई। पहले भारत में ही क्रिकेट मैच दिखाने के लिए बीसीसीआई प्रसार भारती को पैसे देता था, मगर 1993 बाद बहुत कुछ बदला, तब भारत एक बार विश्वकप जीत चुका था। क्रिकेट भारतीयों के जेहन में रचने-बसने लगा था और तभी सचिन के साथ-साथ कुछ नए युवा खिलाड़ी टीम में आए, जिन्होंने अपने शानदार खेल की बदौलत देश और दुनिया में फतह के झंडे गाड़े।


बताने की जरूरूत नहीं कि इस खेल संस्था में खिलाड़ी से ज्यादा राजनेता पदासीन हैं। राज्य से लेकर केंद्र तक, सभी क्रिकेट बोर्ड में उच्चाधिकारी राजनेता ही हैं। फिर भी क्रिकेट भारत में खूब फल फूल रहा है। बीसीसीआई की ताकत से आईसीसी भी वाकिफ है और इसके बातों को मामने को विवश है। सही मायनों में आईसीसी विश्व में क्रिकेट की सुप्रीम संस्था है, मगर व्यावहारिक तौर पर ऐसा लगता नहीं।


आईसीसी बीसीसीआई के हस्तक्षेपों पर मुहर लगाता रहता है। चाहे कोई भी मामला देख लीजिए, मामला स्टीव बकनर को अंपायरिंग से हटा दिए जाने का हो, हरभजन सिंह द्वारा एंड्रयू सायमंड्स को गाली देने का हो, रिव्यू सिस्टम पर टांग अड़ाने का हो या आईसीएल में अपने तो अपने, दूसरे देशों के खिलाड़ियों को जाने से रुकवा देना हो। बीसीसीआई पूरी दुनिया की सबसे ताकतवर क्रिकेट बोर्ड है, जिसकी बात या तो मन से या मन मारकर आखिरकार सभी को सुननी पड़ती है। आप इसे बीसीसीआई की मनमानी कह सकते हैं, तानाशाही भी कह सकते हैं। फिर भी मानना पड़ेगा कि भारतीय क्रिकेट या बीसीसीआई ने मनमानी का यह हक कमाया है। यह दौर जगमोहन डालमिया के समय शुरु हुआ। पैसे के साथ उन्होंने बोर्ड के लिए नाम भी कमाया।


बीसीसीआई ने लोगों की नब्ज पढ़ी। युवाओं से लेकर आम लोगों में क्रिकेट के चढ़ते बुखार को समझा था और उसने प्रसार भारती को पैसे देने के बजाय उल्टे प्रसारण अधिकार बेचने की घोषणा की। इस फैसले से बीसीसीआई को करोड़ों-अरबों रुपयों का फायदा हुआ। दुनिया भर के टीवी चैनल देश की बढ़ती अर्थसमझ रहे थे, जिसे भुनाने में भारतीय क्रिकेट बोर्ड कामयाब रहा।


मगर मनमानी की भी एक हद होती है, वो भी जब अपने घर पर काबिज होने लगे तो विरोध होना लाजमी है। सबसे पहले भारत सरकार द्वारा लाए गए खेल विधेयक पर गौर कीजिए। बीसीसीआई को सूचना के अधिरकार के अंतर्गत लाने की कोशिश की गई, बोर्ड ने इसे न सिर्फ लौटाया बल्कि सरकार को नसीहत भी दे डाली। सुझाव देने वालों में खुद सरकार में बैठे लोग शमिल हैं क्योंकि वो बोर्ड के संचालन में भूमिका निभा रहे हैं। केंद्रीय खेल मंत्री अजय माकन भी बेबस नजर आते हैं।

अब बात अनिल कुंबले की करते हैं। बीसीसीआई से उनका कभी टकराव नहीं रहा, हमेशा टीम हित और उससे ज्यादा देशहित और खिलाड़ियों के समर्पण भाव के लिए वो जाने जाते रहे। चाहे वह ऑस्ट्रेलिया में हरभजन-साइमंड्स विवाद रहा हो या घायल होने के बाद भी मैदान में हाजिरी। नेशनल क्रिकेट अकादमी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना कुंबले नहीं बीसीसीआई पर सवाल खड़े करता है। सबको पता है कि चाबी किसके पास है और प्यादा चलता कैसे है। इसलिए कुंबले ने कहा कि वो सिर्फ नाम का पद नहीं चाहते।


इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड में कई ऐसे पद हैं जो सिर्फ नाम के हैं और काम कहीं और से क्रियान्वित होता है।  दरअसल खामी बोर्ड में नहीं इसके मोल भाव को बढ़ाने वालों में है। वह भी तब, जब बीसीसीआई सरकारी या राष्ट्रीय संस्थान न होने के बावजूद बराबरी का कद रखता हो।
(www.zeenews.india.com/hindi में published)

Saturday, 24 December 2011

दिल्ली की सर्दी- हमें सताती है, आपको याद आती है...


पिछले दिनों 'बिग बी' यानी अमिताभ बच्चन साहब का ब्लॉग पढ़ने का मौका मिला। खबरों के जरिए भी पता लगा कि महानायक अमिताभ को दिल्ली की सर्दी बहुत याद आ रही है। खासकर उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आ रहे हैं। मुझे भी लग रहा है कि चांदनी चौक के पराठे, बंगाली स्वीट्स के चाट और साउथ एवेन्यू से तीन मूर्ती जाकर बस से कॉलेज जाने तक में ठंड का एहसास उनके मन को आज भी गुलाबी बना देता होगा।

वैसे भी गुलाबी ठंड की दस्तक देते ही दिल्ली का दिल और मूड रोमानी हो जाता है। बहुत से लोगों को इसका इंतजार होता है को कईयों को तरसाती है दिल्ली की सर्दी। खाने पीने के लिए तो दिल्ली वैसे भी मशहूर है और जब ठंडी में गरम चाय पराठे और चाटपटी चाट मिले तो फिर क्या कहना?


बात फिर से बच्च्न साहब की करते हैं। मुंबई में रहते हुए वो जरूर किसी न किसी चीज को मिस करते हैं। अमिताभ ने कहा, ‘वह रोमांच, वह सादगी, वह विश्वास अब सब चला गया। हम रात में अपने घर के दरवाजे और खिड़कियां खोलकर सोते थे। घर के दरवाजे कभी बंद नहीं किए जाते थे। कभी कभी तो हम घर के बाहर या छत पर सोते थे। कोई सुरक्षागार्ड नहीं बस एक बेफिक्र जीवन

क्या कीजिएगा अमिताभ साहब, हम नौजवान अपनी छोटी सी मौज मस्ती भरे पल में कुछ न कुछ रोमांचक तो कर ही लेते हैं। हमारे लिए न सुरक्षा बाधा है और न कोई चार दीवारी, बस उन्मुक्त होकर पंक्षी की तरह जी रहे हैं। हम आपकी स्थिति को समझ सकते है। बड़े लोग बड़ी और कड़ी सुरक्षा में रहते हैं।

यहां दिल्ली में हर मौसम का मजा लिया जा सकता है। हम सर्दी में सिसकियां लेते है, गर्मी में लू भी झेलते हैं और 'रोमांसिग इन द रेन ऑफ देल्ही' का भी मजा चखते हैं। अगर कमरा उपरी मंजिल पर हो तो डांसिंग इन रेन का भी लुफ्त उठाते हैं।

खाने पीने से घूमने तक अब आपको हमेशा याद करेंगे बच्चन साहब। दिल्ली से आपने अपने दिल को जोड़ा इसका धन्यवाद। हम तो अपने दोस्तों के साथ दिल्ली के रेस्त्रां और बाजार संग मॉल का मजा ले रहे हैं। हां अब खुली खाट पर बैठकर तड़के और रोटी वाली थाली यहां नहीं मिलती, इसके लिए दूर तक जाना पड़ता है। कुछ चमक ए.सी और एक दूसरे का हाथ थामे फूड क्लब में जाकर प्रेम में डूबने का मन और मौका मिल ही जाता है।


कितना अच्छा होता अगर आप से पत्र द्वारा त्वरित बात कर पाता, पर अब ब्लॉग का दामन है। इसी पर बोलकर अपने मन की बात कह देता हूं। आशा है आगे भी कुछ दिलचस्प बातों से सामना होगा। अमिताभ साहब की बातों से अब मुझे मेरे मित्र की बात याद आती है, वो हमेशा कहा करता है कि समाज में आपका कद जितना बड़ा होता है, यहां छिपने की जगह उनती ही कम हो जाती है। फिर भी आपने अपने कद और अपनी छाया को कुछ हद तक तो छुपा ही लिया है।

Monday, 5 December 2011

भ्रष्टाचार को आड़, एफडीआई पर वार

जब अन्ना हजारे ने अगस्त में जनलोकपाल के लिए आंदोलन कर रामलीला मैदान में अपना अनशन खत्म किया, उस समय केंद्र सरकार ने यह भरोसा दिलाया कि संसद के आने वाले शीतकालीन सत्र में इस बिल को पारित कर भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून बनाया जाएगा। अन्ना की भी यही मांग थी और लोगों को इसी का इंतजार था कि आखिर इस आंदोलन का अंजाम भ्रष्टाचार का रोकथाम होगा या नहीं।

अब शीतकालीन सत्र भी शुरु हो गया है लेकिन दो सप्ताह बाद भी लोकपाल बिल की चर्चा तक नहीं हुई है। सरकार भी खुश है कि मीडिया, जनता और विपक्ष का ध्यान एक नए मुद्दे की तरफ आकर्षित हुआ। इसे सरकार की चालाकी कहें या कमजोरी- जनलोकपाल, भ्रष्टाचार, संचार घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल धांधली तथा भूमि विवाद जैसे मुद्दों को दबाने के लिए एफडीआई को अचानक से चर्चा का विषय बना दिया। कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आड़ लेने के लिए सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का नया झुंझुना सबके हाथ थमा दिया। नतीजा आपके सामने है, सब एफडीआईकर रहे हैं।

याद कीजिए पिछले दिनों यात्राओं का दौर निकल पड़ा था। 11 अक्तूबर को आडवाणी ने अपनी छठी राजनीतिक यात्रा जन चेतना की शुरुआत जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताबदियारा (बिहार) से की। योग गुरु बाबा रामदेव ने अपनी 10 हजार किलोमीटर की भारत स्वाभिमान यात्रा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि से 20 सितंबर से शुरू की। आगामी यूपी चुनाव में जीत के इरादे को आधार देने के लिए सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बसपा के खिलाफ क्रांति रथयात्रा निकाली। रही सही कसर राहुल गांधी ने पूरी की। कांग्रेस के राजा बनने को तैयार राहुल की चुनावी व व्यापक जन संपर्क यात्रा भी यूपी से शुरु हुई। इसके अलावा उपवास, व्रत और धरना अलग है, जो अन्ना और अन्य राजनेता कर रहे या कर चुके। ये सब धरे के धरे रह गए और आ गया एफडीआई।  


इस बीच संसद के शीतकालीन सत्र पर हम सब सांसद और सदन की कार्रवाही पर जैसे ही नजर डालते थे, आशा करते कि कुछ तो चर्चा देखने मिले, पर सभापति दो मिनट में पहले सदस्यों को शांत कराते और दूसरे क्षण परेशान होकर सदन स्थगित कर देते। मजेदार बात तो यह कि इधर संसद बाधित होती थी और उधर राहुल गांधी लाईवहो जाते थे। युवक कांग्रेस सम्मेलन बुनियाद तो बार-बार ब्रेकिंग बनता रहा।

संसद के शीतकालीन सत्र में पहले तीन दिन तक यूपी बंटवारा, पी चिदंबरम का मुद्दा हंगामा बरपाता रहा। सरकार भी संकट मोल नहीं लेना चाह रही। साथ ही सरकार को यह भी डर सता रह है कि अगर संसद में सब कुछ सुचारू रूप से चलता रहा तो कालेधन और संचार घोटाले के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर भी विपक्ष उसे घेरेगा, जिसपर कहीं न कहीं सरकार तत्काल कमजोर नजर आ रही है। सरकार की तरफ से सबसे बड़े संकट मोचकों में से एक पी चिदंबरम का 2-जी आवंटन घोटाला में नाम अना भी सरकार के लिए एक परेशानी है।

अगर गौर से देखा जाए तो विपक्ष की यह मांग अवसरवादी नजर आता है। यह सही है कि पी चिदंबरम का नाम 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आ चुका है, लेकिन संदेह के बादल एनडीए सरकार तक फैले हुए हैं। शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर उछालते रहें तो रोजाना टूटने की आवाजें आएंगी ही।

बार-बार सत्र के बाधित होने और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा न होने से देश का कितना नुकसान होता है, यह हमारे सांसद बेहतर समझते हैं, जनता जो भुगतती है, सो अलग। इस बार बाधा पहुंचाने के मुद्दों में गृहमंत्री का बहिष्कार भी शामिल हो गया है। विपक्ष की मांग है कि गृहमंत्री पी चिदंबरम 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में बराबर के दोषी हैं, इसलिए उन्हें इस्तीफा देना चाहिए।


राजनीतिक शुचिता बनाए रखना हो तो कोई भी गंदगी नहीं रहनी चाहिए। भ्रष्टाचार पर मंत्री और सरकार के चरित्र की बात करने वाला विपक्ष इस बात को अच्छी तरह समझता है। लेकिन उसका मकसद किसी न किसी प्रकार सरकार को परेशानी में डालना है,  इसलिए शीतकालीन सत्र के पहले यह तय कर लिया गया कि पी चिदंबरम का इस्तीफा मांगा जाए। दूसरी ओर केंद्र सरकार की नीयत भी कोई पाक साफ नहीं है। हंगामे के बीच सरकार शीतकालीन सत्र पूरा कर लेगी और देश हित के जरूरी मुद्दे पीछे छूट जाएंगे।

जन प्रतिनिधियों को तो संसद में बैठकर नियम बनाना और कुछ महत्वपूर्ण फैसले लेने होते है, पर लगता नहीं कि वो इस पर गंभीर हैं। संसद में 31 से ज्यादा बिल लंबित है, कुछ जरूरी बिल जिस पर लोगों के साथ–साथ विशेषज्ञों की भी नजर है उनमें-
·         व्हिसल ब्लोअर विधेयक पेश किया जाना है, जिसमें किसी सरकारी मुलाजिम द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग करने या भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत किए जाने और शिकायतकर्ता को सुरक्षा दिए जाने का प्रावधान है।
·         राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक है, जिसमें गरीब जनता को न्यूनतम मूल्य पर भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
·         भूमि अधिग्रहण विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर मौजूदा सत्र में चर्चा होनी थी और इनके पारित होने पर फैसला होना बाकी है।
·         जन लोकपाल तो पहले ही शीतकालीन सत्र में पास कराने की सरकार की बाध्यता बनी हुई है। इस मुद्दे पर अन्ना के आंदोलन को कौन भूल सकता है।


अब सवाल यह है कि क्या यह मसला मीडिया के प्राइम टाइम मसाले और राजनेताओं के बैठक और विरोध तक सामित रह जाएगा या सरकार इसे मकाम पर पहुंचाएगी? रीटेल क्षेत्र में एफडीआई को सरकार महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक विकास और लोगों के हित से जोड़कर दिखा रही है, मगर आम जनता को रीटेल स्टोर के एफडीआई और मेगा स्टोर पर जाने की कितनी फिक्र है, यह हम आप अच्छी तरह जानते हैं। यह न तो शाइनिंग इंडिया है, न भारत उदय है और न ही भारत निर्माण। 
www.zeenews.india.com/hindi/news/category/ज़ी-स्पेशल में प्रकाशित

Sunday, 20 November 2011

क्रिकेट से क्यों रूठा है दर्शक?

इन्द्रमोहन कुमार

अभी तक फिक्सिंग के गंभीर आरोप से भारत का क्रिकेट बचता रहा है, जब कभी यह मामला उठता है, तो हम पाक साफ की कामना करते है। कांबली विवाद इसका उदापरण है। अभी तो भारत में क्रिकेट खेल से बढ़कर एक जुनून है। इसे एक धर्म तक की संज्ञा दे दी गई। अब सभी कोशिश कर रहे हैं कि यह आलम बना रहे। बहुत ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब भारत में क्रिकेट विश्वकप 2011 का मैच खेला गया। इस दौरान भी कई मैचों में खाली स्टेडियम को देखकर लगा कि इस खेल से लोग दूरी बना रहे हैं। क्रिकेट विश्वकप शुरू होने से पहले लोग कहने लगे थे कि टी-20 के आने के बाद अब एकदिवसीय क्रिकेट के दिन खत्म हो गए हैं। मगर क्रिकेट के आला अधिकारियों और खिलाड़ियों को उम्मीद थी कि अगर भारत यह खिताब जीत जाता है तो यह खतरा भी खत्म हो सकता है।
अब जाने कब दिखेगा ऐसा नजारा: यह तस्वीर है ईडेन गार्डेन में 1996 विश्वकप का, जब भारत सेमीफाइनल में बाहर हो गया था।
 

फिर भी भारत के लीग मैचों के अलावा अन्य किसी भी टीम के मैच के दिन  स्टेडियम पूरा भरा नहीं दिखा। हालांकि भारत जैसे-जैसे श्रृंखला में आगे बढ़ता रहा, रोमांच बढ़ता गया। फिर भी कहना होगा कि विश्वकप के बाद क्रिकेट में फिर वैसी भीड़ नहीं दिखी। पिछले दिनों इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के साथ हुए मैच इस बात के गवाह हैं।

अब आइए इसके कुछ कारण खोजते हैं। जो सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है वो है अत्यधिक क्रिकेट खेला जाना। खिलाड़ी, अधिकारी, बोर्ड और पूर्व दिग्गज भी मान रहे हैं कि हाल के दिनों में कुछ ज्यादा क्रिकेट खेली जा रही है। खिलाड़ियों के फिटनेस से लेकर उनके खेल और प्रदर्शन पर भी अत्यधिक प्रभाव पड़ा है। निरंतर खेल में निरंतर अच्छा प्रदर्शन देखने को नहीं मिलता है। युवराज सिंह से लेकर सचिन तेंदुलकर तक इसके उदाहरण हैं। ये बात अलग है कि सचिन आज जो भी खेल रहें है वो रिकॉर्ड ही बन रहा है।

हाल ही में भारत-वेस्टइंडीज कोलकाता टेस्ट के पहले दिन तक मात्र 98 टिकट की बुकिंग हुई थी। घरेलू मैदान पर भारत के मैच में ऐसी दिलचस्पी चिंताजनक है। एक समय था जब भारत में रणजी ट्राफी मैच देखने के लिए भी दर्शकों की भारी भीड़ जुटती थी। तब दर्शक टीवी पर अपना चेहरा दिखाने के लिए अपने चेहरे पर तिरंगा नहीं बनवाते थे और न ही अजीबो-गरीब हरकतें करते थे। राजधानी के फिरोजशाह कोटला मैदान और कानपुर के ग्रीन पार्क में 70 के दशक के मैच देखने के लिए भारी भीड़ जुटती थी। वह जुनून तो अब खत्म ही हो गया है। अब दिलीप और देवधर ट्राफी क्या टेस्ट के मैच देखने के लिए गिनती के दर्शक जुट पाते हैं।

एक सच यह है कि अब  खिलाड़ी खेलने से बचने के तमाम बहाने खोजते हैं। मगर ये चोटिल होने पर भी आइपीएल में खेलने से परहेज नहीं करते, क्योंकि हमें आपको सब को पता है कि वहां पैसा बोलता है।

उल्लेखनीय तथ्य यह है कि क्रिकेटरों के काम का बोझ बढ़ाकर हर तरह के संस्करण के रूप में और हर मौसम में खेलने को क्रिकेट की राशि से जोड़ा गया है। टेस्ट क्रिकेट व एकदिवसीय प्रारूप के शुरूआत के साथ भी यही काम  किया गया। मगर दूसरा तथ्य यह है कि इस खेल को जिंदा रखने की भी जरूरत थी, जिसे लोग धीरे- धीरे मानने लगे।

अभी क्रिकेट को एक और क्रांति की अवधि में देखा जा रहा है। सन् 2000 के बाद खेल का एक फटाफट संस्करण टी-20 की शुरुआत की गई। फुटबॉल और रग्बी की तरह कम अवधी का यह प्रारूप काफी लोकप्रिय हुआ। मगर इस रोमांच का एक दूसरा पक्ष भी देखने को मिला। क्रिकेटरों को इससे अतिरिक्त कमाई हो रहे हैं। हर किसी को अब डर है कि ज्यादातर क्रिकेटरों का भविष्य या करियर कम हो रहा है। शांत क्रिकेट कौशल के दिखावे के लिए अनुमति नहीं देता है, अधिक जोखिम और दिन ज्यादा मायने रखता है।  मगर सवाल है कि दर्शक इन सबके बीच है कहां?

आईसीसी दिन-रात टेस्ट शुरू करने की सोच रही है, मगर व्यस्त लोग सारा दिन काम करते हुए रात में देखने  बैठेंगे या नहीं, यही डर है। जो भविष्य में इस प्रारूप खेलेंगे, वे भी आश्वस्त नहीं है कि कोई भी इसे पूरा कर सकते हैं या नहीं ?  पाकिस्तान के पूर्व कप्तान वसीम अकरम की राय है कि भारत के तेज गेंदबाजों के घायल होने में बहुत अधिक क्रिकेट खेलना बड़ा कारक है। उनका नदारद रहना भी दर्शकों पर असर करता है।  इसका उदाहरण जहीर खान हैं। दर्शक तो यहां अपने स्टार खिलाड़ी को देखना चाहते हैं। तो क्या आप खाली स्टेडियमों के लिए खेलते हैं और टेलीविजन पर एक भाग्य का भुगतान कर खेल को देखती है? यह खेल मृत हो सकता है अगर आप यह सोचते हैं कि दर्शक मैदान में नहीं आते है।

.और यह नजारा है भारत में आयोजित 2011 विश्वकप का जब भारत यह खिताब जीता।
पूरी दुनिया में टेलीविजन कंपनियां क्रिकेट से रकम जुटा रही हैं, पर क्रिकेट ताक पर है। सब कुछ के बाद मैच से पहले शो के साथ 10 घंटे का एक खेल भरता है, तो प्रशासकों को खेल को बेचने के अलावा कुछ नहीं करना है। टीवी कंपनियां सिर्फ अधिकारियों के लिए अधिक से अधिक पैसा बोली रखने पर जोर देती है। तो क्या भविष्य में यह खेल दुखी करेगा? और अगर फिंक्सिंग का फांस दिखेगा तो दर्शक कम होंगे ही।

भारत में क्रिकेट का मक्का कहा जाने वाला ‘कोलकाता- ईडन गार्डेन हमेशा दर्शकों से भरा रहता था, 1,00,000 लोग भीतर और 10,000 से ज्यादा बाहर। सभी जगह भरी रहती थीं। अब दर्शक दीर्घा में काफी कम क्रिकेट प्रेमी दिखाई देते हैं। यही वह मैदान और स्टेडियम है जहां क्रिकेट का जुनून दिखता था। आज आप यह माने या नहीं पर क्रिकेट से दर्शक दूरियां बना रहे हैं।

यह प्रशंसक है। सिर्फ इतना पता है, अगर उन्हें क्रिकेट में डाल दिया तो फिर टेलीविजन हो या स्टेडियम वो रोमांच चाहेंगे, मगर कंपनियों रकम जुटाने के लिए यह कर रही हैं। अब ईएसपीएन, निंबस, सोनी, नियो और प्लस मिल गया है। वे सभी भारत में क्रिकेट के लिए रकम जुटा रहे हैं। तो यह एक बोली युद्ध है। अगर टीवी पर सब बिकेगा तब खेल का कोई मतलब नहीं है, यह बेकार है। अगर लोग आते नहीं और देखते नहीं, तो यह दुर्भाग्य है। क्या आप खाली स्टेडियमों के लिए खेलते हैं और टीवी आपके भाग्य का भुगतान करती है?

क्रिकेट के जनक इंग्लैंड में हालात-
यहां वर्ष 2000 से इस दिशा में लगभग 5.4 मिलियन पाउंड का काम किया जा चुका है। पिछले एक दशक से दर्शकों की सुविधाओं पर भी ध्यान दिया गया है, पर दर्शक का ध्यानाकर्षण नहीं हुआ है। अंग्रेजों द्वारा शुरू इस ‘जेंटलमैन’ खेल को अक्सर ‘लेजीमैन’ का खेल भी कहा जाता है, क्योंकि लोगों के पास इतना समय नहीं है। इसी कारण यूरोप व अमेरिकी महाद्वीपों में यह खेल उतना मशहूर नहीं है।

कुछ और
क्रिकेट के महानायक सचिन तेंदुलकर ने भी वन-डे मैचों को रोमांचक बनाने के लिए आईसीसी को सुझाव दिया, जिसे फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया गया है। अब भद्रजनों के इस गेम को लोकप्रिय बनाए रखना ही एक चुनौती लग रहा है। फिक्सिंग का फांस लोगों को अलग से परेशान- हैरान कर रहा है।

याद कीजिए नोएडा का फार्मूला वन रेस। वहां जाने वालों ने कहा कि लगभग 1 लाख लोगों ने इस रप्तार के रोमांच का मजा देखा। वह भी जुनून था। टिकट क्रिकेट से ज्याद महंगा था और भीतर यह नजारा साफ देखा जा सकता था। फिर भी विशेषज्ञों ने इसे खास वर्ग का खेल करार दिया। वह तीन घंटे का रोमांच था जिसे पहली बार भारत में आयोजित किया गया। अब क्रिकेट को धर्म का दर्जा देनेवालों की बारी है..!

Saturday, 5 November 2011

क्रिकेट के पीछे ‘खिलाड़ी’

मैच फिंक्सिंग का फंदा एक बार फिर क्रिकेट को बदनाम कर गया। भद्रजनों का कहा जाने वाला यह जेंटलखेल खासकर युवा खिलाड़ियों को क्रिकेट को भ्रष्टाचार में डुबो रहा है। उससे भी हैरानी भरी बात यह कि इसमें दोषी पाए जाने के बाद पाकितानी क्रिकेटर मोहम्मद आमिर ने कहा कि हमें इससे बचने के लिए बोर्ड से प्रशिक्षणनहीं दिया गया। वाह रे खिलाड़ी! अब आपको बताना होगा कि किस हद तक सट्टेबाजों से बचो या कहां तक मैच फिक्स करो।

क्रिकेट के इतिहास में मैच फिक्सिंग हुए हैं पर यह पहली बार है जब दोषी पाए जाने के बाद क्रिकेटरों को जेल की सजा दी गई है। पाकिस्तान के तीन उभरते क्रिकेटर सलमान बट्ट, मोहम्मद आसिफ और तेज गेंदबाज मोहम्मद आमिर और बुकी मजहर मजीद को स्पॉट फिक्सिंग मामले में जेल की सजा सुनाई गई। इंग्लैंड के साथ 2010 में चौथे टेस्ट मैच में इन तीनों खिलाड़ियों पर स्पॉट फिक्सिंग का आरोप लगा था। सलमान बट्ट टीम के पूर्व कप्तान भी रहे हैं। इन क्रिकेटरों को हालांकि अपनी सजा का केवल आधा समय ही जेल में बिताना पड़ सकता है क्योंकि अच्छा बर्ताव होने पर इन्हें लाइसेंस पर रिहा किया जा सकता है।

फिक्सिंग से पुराना है रिश्ता
जितना पुराना खेल है क्रिकेट, कुछ उतना ही पुराना मैच फिंक्सिंग का भी खेल है। इसमें पहला मामला तब आया था जब क्रिकेट उतना भी नहीं खेला जाता था। मगर क्रिकेट में फिक्सिंग की पहली घटना सबसे पहले 1817 से 1820 के आसपास नजर आई थी। उस समय विलियम लैंबार्ट नामक बल्लेबाज पर मैच फिक्सिंग के लिए प्रतिबंध लगाया गया था। हालांकि इसके बाद वह फिर कभी क्रिकेट नहीं खेल पाए। यह वह जमाना था जब सिंगल विकेट क्रिकेट खेली जाती थी और तब इस तरह के मैचों पर सट्टा लगाना आसान होता था।


इतिहासकार डेविड अंडरडाउन ने अपनी किताब स्टार्ट ऑफ प्ले क्रिकेट एंड कल्चर इन एटीन्थ सेंचुरीइंग्लैंड में लिखा है कि असल में सिंगल विकेट क्रिकेट में पूरे 11 खिलाड़ी नहीं होते थे और इसलिए उन्हें फिक्स करना आसान था। अंडरडाउन के अनुसार, 1817 में इंग्लैंड और नाटिंघम के बीच खेले गए मैच में कुछ खिला़ड़ियों ने जानबूझकर लचर प्रदर्शन किया था। इनमें विलियम लैंबार्ट भी शामिल थे जिन्हें उस समय का सर्वश्रेष्ठ बल्लेबाज माना जाता था। लैंबार्ट के ही साथी फ्रेडरिक बियुक्लर्क ने इसकी शिकायत एमसीसी से की जिसने लैंबार्ट को लार्ड्स में खेलने से प्रतिबंधित कर दिया था।


इस तरह से लैंबार्ट दुनिया के पहले ऐसे क्रिकेटर थे जिन पर मैच फिक्सिंग के लिए प्रतिबंध लगा था। इंग्लैंड और नाटिंघम के बीच फिक्स हुए उस मैच के बारे में कहा जाता है कि दोनों टीमों के कुछ खिलाड़ियों ने जानबूझकर अपने विकेट गंवाए, कैच टपकाए और यहां तक कि ओवर-थ्रो से रन दिए।

अब जब खेल से ज्यादा पैसा अन्य स्रोत से भी आने लगे तो खिलाड़ी आसानी से इसके प्रति आकर्षित होते हैं। पहले क्रिकेटरों को ज्यादा विज्ञापन भी नहीं मिलता था, और अगर खिलाड़ी संपन्न परिवार से नहीं हो तो इस खेलमें आने की संभावना अधिक हो जाती थी। जो मैच फिक्सिंग की वजह बनता है। ऐसा नहीं है कि पाकिस्तान की जमीं सिर्फ इसी के लिए जानी जाती हो। यहां ऐसे दिग्गज खिलाड़ी भी हुए हैं जिसका लोहा आज भी दुनिया मानती है।

स्पॉट फिक्सिंगका खुलासा बंद हो चुके ब्रिटिश अखबार न्यूज ऑफ द वर्ल्डने अपने एक स्टिंग ऑपरेशन में किया था। बट, आमिर और आसिफ ने गत वर्ष अगस्त में लॉर्ड्स टेस्ट के दौरान जानबूझकर नो-बॉल करने के लिए बुकी मजहर मजीद से पैसे लिए थे। सटोरिए ने अदालत से कहा था कि इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा तेज गेंदबाज आसिफ को इसलिए दिया गया ताकि वह उसके प्रति वफादार रहे और पाकिस्तानी टीम के अंदर ही मौजूद एक दूसरे फिक्सिंग रैकेट की तरफ उसका झुकाव न हो सके।


भारत में स्थिति
इन हालातों के बीच भारत में लंबित पड़े 11 साल पुराने मैच फिक्सिंग मसले पर भी लोगों का ध्यान जाना लाजिमी है। दिल्ली पुलिस पिछले 11 सालों में मैच फिक्सिंग की गुत्थी नहीं सुलझा सकी है वहीं लंदन पुलिस ने महज 15 महीने के अल्प समय में क्रिकेट में भ्रष्टाचार फैला रहे खिलाड़ियों को सलाखों के पीछे भेज दिया। भारत के चार क्रिकेटर भी ऐसे ही फेर में फंसे थे, लेकिन आईसीसी ने उनपर प्रतिबंध लगाकर मामला रफा-दफा कर दिया। यह वही दिल्ली पुलिस है जिसे सबसे पहले फिक्सिंग का पता चला था।

साल 2000 में यह बात सामने आई थी कि पूर्व दक्षिण अफ्रीकी कप्तान हैंसी क्रोन्ये और उनके साथी खिलाड़ी निकी बोये और हर्शेल गिब्स मैच फिक्सिंग में लिप्त थे। साथ ही टीम इंडिया के पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन, मनोज प्रभाकर, अजय जडेजा और अजय शर्मा पर भी संदेह व्यक्त किया गया था। लोग इस मामले को लगभग भूल चुके थे और खिलाड़ी भी निश्चिंत। पर अब लगता है कि यहां भी कुछ सुगबुगाहट शुरू हो जाएगी।

उल्लेखनीय है कि साल 2000 में दिल्ली पुलिस को एक कुख्यात बुकी और तत्कालीन दक्षिण अफ्रीकी कप्तान हैंसी क्रोन्ये के बीच हुई फोन पर बातचीत का रिकॉर्ड हाथ लगा था। इस रिकॉर्ड के मुताबिक क्रोन्ये ने मैच गंवाने के लिए पैसे कबूले थे। जांच में क्रोन्ये ने मैच फिक्सिंग के आरोप कबूल लिए थे। उन्होंने पाकिस्तान के सलीम मलिक और भारत के मोहम्मद अजहरुद्दीन व अजय जडेजा के नाम उजागर किए थे। उस समय जडेजा पर आईसीसी ने चार साल का प्रतिबंध लगाया था, जबकि सलीम मलिक और अजहर पर ताउम्र प्रतिबंध लगा दिया था।


भारत जैसे देश में यह खेल से कहीं अधिक लोगों की भावनाओं से जुड़ गया है। इसकी लोकप्रियता को देखकर तो अब यही लगता है कि अगर विश्व में इस जेंटनमैनके खेल को स्मार्ट और लोकलुभावन बनाए रखाना है व पाकिस्तान में क्रिकेट का भविष्य बचाना है, तो सरकार के साथ साथ बोर्ड और जिग्गज खिलाड़ियों को भी इसमें पहल करनी होगी।

पाकिस्तान में वैसे भी आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट बंद है, खिलाड़ी खेल से ज्यादा ग्लैमर की तरफ झुक रहे हैं। यह घटना इसे और भी गंभीर बना सकता है, यानी ऐसा कहना पड़ सकता है कि पाकिस्तान में कोई पाक साफ खिलाड़ी तो है ना? और निश्चित हीं आने वाली पीढ़ी इससे प्रभावित होगी।

Sunday, 11 September 2011

कैसे कहें कि दिल्ली 'वर्ल्ड क्लास' है ?


दिल्ली हाईकोर्ट में हुए बम विस्फोट ने यह साबित कर दिया कि जानकारी और चौकस रहने के बावजूद हम हमले नहीं रोक सकते. बस ऊपर वाले से दुआ करते रहें कि हम पर कोई मुसीबत नहीं आए, सरकार से फ़रियाद करना बेईमानी है. जनता सह रही है और सरकार खामोश रहती है. शायद  कोई  मसीहा  आकर  हमारी रक्षा करेगा.

खैर छोड़िये इन बातों कोसरकार सिर्फ बहाने बना सकती है और विपक्ष आरोप. फिर भी जो मंजर दिल्ली हाई कोर्ट विस्फोट के बाद देखने को मिला उससे यह साफ़ जाहिर हो रहा था कि किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए दिल्ली तैयार नहीं है. आध दर्जन से ज्यादा मौत तो आपात सुविधा  रहने के कारण हो गया. वहां पर मौजूद लोग कह रहे थे कि अगर एम्बुलेंस की सुविधा उपल ब्ध होती तो कुछ और जानें बचाई जा सकती थी. जो एम्बुलेंस मौजूद थे उसमे जरूरी जीवन रक्षक उपक्रम भी नहीं लगे थे. अगर कुछ में भी ऐसी सुविधा रहती तो घायलों को फौरन ये सुविधा दी जा सकती थी. ये हाल संसद भवन और राष्ट्रपति भवन के दो किलोमीटर दायरे का है.

सबसे नजदीकी अस्पताल राममनोहर लोहिया भी केंद्र सरकार के बड़े अस्पतालों में से एक है जहां अधिकतर घायलों को भर्ती कराया गया. वहां क्या हालत थे ये किसी से छुपा नहीं है. घायलों को यहां तक लाने में दो घंटे का समय लगा. कुछ घायलों ने तो रस्ते में ही दम तोड़ दिया था क्योंकि समय पर चिकित्सा सुविधा नहीं मिल पायी.

राष्ट्रमंडल खेलों के समय दिल्ली को चमकाने की मुहिम चली वो भी अब मुंह चिढ़ाती है. बड़ी- बड़ी बसें चलींचौड़े सड़क बनाए गएतेज यातायात के लिए उपरी पूल बनेयहां तक कि सौ से ज्यादा आधुनिक एम्बुलेंस ख़रीदे गए. मगर दुर्भाग्य देखिये कि ज्यादातर एम्बुलेंस धूल फांक रहे हैं. ऐसे आयोजन के लिए हजारों करोड़ रुपये फूंक दिए गए लेकिन आपात चिकित्सा सुविधा की तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहा. अगर ये हाल देश की राजधानी दिल्ली का है तो अन्य जगह की बात बेईमानी होगी. 
  
राम मनोहर लोहिया अस्पताल में खून संग्रह केंद्र भी हैयानि ब्लड बैंक की सुविधा मौजूद है, लेकिन संयोग देखिये कि धमाकों के बाद सबसे ज्यादा खून की कमी यहीं पर रही. लोग अपने ही हाथों एक दूसरे और अनजानों की सहायता कर रहे थे.

सरकार की सुविधा बिलकुल सरकारी बनी हुई थीसब कुछ देरी से. हालत तो तब बदतर हो गए जब डाक्टरों की जगह वार्ड ब्यॉय मरीजो को प्लास्टर लगा रहे थे. पूरे अस्पताल में अव्यवस्था फैली हुई थी वो भी ऐसे आपात घड़ी में. मिनी आपरेशन थिएटर पूरे दिन खून से रंगा लग रहा था. कोई भी समुचित व्यवस्था कहीं नहीं दिख रही थी. जानकारी के आभाव में परिजन इधर- उधर भटक रहे थे.

असल में आम आदमी की कीमत कितनी आम है ये सरकार ने दिखा दिया. बगल में संसद भवन और सांसदों की सुरक्षा में करोड़ों रुपये बस कुछ घंटों में खर्च हो जाते हैं पर घायल मरीजों के लिए इतनी सी सुविधा नहीं मिल पाती कि वो अपनी जान बचा सकें.

बात इतनी पर ख़त्म हो जाती तो फिर भी समझा जा सकता था. राममनोहर लोहिया अस्पताल में दो दिन बाद के हालात देखिये, जो मरीज पूरी तरह ठीक भी नहीं हुए थे उन्हें अपने घर लौटने को कह दिया गया. जैसे कुछ लोगों को एक्स-रे रिपोर्ट में कील और छर्रे आने के बाद भी  दवा  दे  कर कह दिया गया कि वो वापस घर जाएंदवा खाने पर छर्रे निकल जाएगा. कुछ मरीजों और  परिजनों ने तो डाक्टरों के व्यवहार भी शिकायत की और कहा कि उनका बर्ताव अच्छा नहीं था. कुछ भी पूछने पर डांट देते थे. परा मेडिकल स्टाफ खोजने पर भी नहीं मिल रहे थे.
   
अपनों को खोजने आए परिजनों की बदकिस्मती देखिये कि शाम तक पीड़ितों की सूची तक जारी नहीं की गयी थी. इनकी मदद के लिए  तो प्रशासन कुछ कर रहा था न ही दिल्ली पुलिस आगे  रही थी. वहीं नेताओं और मत्रियों की सुरक्षा में अस्पताल और पुलिस ज्यादा तत्पर दिखी. ऐसे में अस्पताल आये राहुल गांधी सरीखे नेताओं के खिलाफ परिजन अगर नारे लगते हैं तो क्या गलत है? वैसे भी जनता आजकल नेताओं से ज्यादा गुस्साई हुई है.  
इससे पहले मरीजो को खाने के लिए जो खाना दिया गया वह भी साफ़ नहीं था. कुछ खानों में तो फंगस लगे होने तक की शिकायत की गई. अगर राजधानी में अस्पतालों और स्वास्थ्य सेवाओं का यही हाल रहा तो हमारे योजना आयोग के उपाध्यक्ष जीडीपी का जितना प्रतिशत भी इसमें लगा देंलाभ जरूरतमंद आम लोगों तक नहीं पहुंच पाएगा. वैसे भी अमीर लोग महंगे अस्पतालों में ही इलाज करवाते है.

तो हमारी राजधानी दिल्ली कब वर्ल्ड क्लास बनेगी यह आम लोग तो नहीं समझ पाएं, लेकिन करोड़ों रुपये खर्च करके हमारे रहनुमा वाहवाही जरूर लूट लेते है. भले ही तंत्र सही काम करे या नहीं. आखिर कैसे और कब बनेंगे हम विश्वस्तरीय?

Saturday, 27 August 2011

घाटे में 'राष्ट्रीय संपदा'


 सीएजी की रिपोर्ट भारतीय रेल पर भी सवाल उठा गया. आरक्षण प्रणाली से लेकर तत्काल और अग्रिम आरक्षण सुविधा की जांच करने पर पाया कि जिन आम जरूरतमंद यात्रियों की सुविधाके लिए यह सेवा बनी है वो घोटालेबाजी के कारण इसका पूरा लाभ नहीं ले पाते.
कंप्यूटरीकृत आरक्षण प्रणाली की चर्चा इसलिए क्योंकि वर्तमान में लोगों को रेलवे से अगर कोई बड़ी शिकायत है, तो वह टिकट खिड़की से ज्यादा कुछ भी नहीं. लेट लतीफी तो फिर भी सह लेंगे मगर जब टिकट ही नहीं मिले तो यात्रा क्या ख़ाक करेंगे?

मजबूर होकर लोग दलाल की शरण में जाते हैं. सरकार की दलील है कि सारा काम पारदर्शी है. मगर जांच में पाया गया कि टिकट खिड़की खुलने के चंद ही मिनटों में तत्काल कोटे की सभी टिकटें खत्म हो जाती हैं. गौरतलब है कि रोजाना लाखों लोग रेलवे की इंटरनेट आरक्षण सुविधा के जरिए टिकट आरक्षित कराते हैं. यात्री इस गड़बड़ी में रेलवे कर्मचारियों और दलालों की मिलीभगत की लंबे समय से शिकायत कर रहे हैं. शिकायत होती है पर सुनवाई कोई नहीं करता. मगर यह पहली बार हुआ है कि किसी राष्ट्रीय एजेंसी ने इस शिकायत पर मुहर लगाई है.

कुछ महीने पहले एक विकल्प के रूप में रेलवे का नया वेब पोर्टल आया, जिसका भट्टा बैठ चुका है और अब यह बंद पड़ा है. कब दुरुस्त होगा कोई नहीं कह रहा.

पिछले आठ साल से यात्री किराए में कोई इजाफा नहीं किया गया है, पर ऐसा नहीं है कि आपकी यात्रा सस्ती हुई है. आरक्षण और सरचार्ज के नाम पर कई अतिरिक्त कर लगा दिए गए. हां, दैनिक यात्रियों को थोड़ी राहत जरूर दी गयी. सुविधा तो बढ़ी नहीं और रफ्तार यथावत है. ट्रेनें घंटों लेट चलती हैं.

आईआरसीटीसी से खानपान का ठेका छिनने के बाद भी ट्रेनों में और रेलवे स्टेशनों पर मिलने वाले खाने में कोई सुधार नहीं हुआ है. इसके उलट मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों के पेंट्रीकार से मिलने वाली थाली महंगी हो गयी. 35 रूपये में मिलने वाला साधारण खाना कब 65 का हो गया पता भी नहीं चला. स्पेशल की तो बात ही छोड़ दें. हालांकि आधिकारिक तौर पर इसकी कीमत 30 रुपया ही बताया गया.
राजधानी जैसी वीआइपी गाड़ी में भी खाना वीआइपीनहीं रहा, बिलकुल सामान्य सी थाली दी जाती है इस ट्रेन में! खाने की पैकिंग जरूर अच्छी रहती है, जिसका फंडाआप समझ सकते हैं.
उधर स्टेशन पर आम लोगों के लिए शुरू किया गया जन आहारभी स्टॉल से नदारद है. रेलवे की बोतल बंद पानी रेल नीर12 रू में बाजार में सबसे सस्ती जरूर है.

संसद में पेश सीएजी ने अपनी इस रिपोर्ट में रेलवे के वित्तीय घाटे का भी आंकलन किया है. इसका बोझ अब एसी में सफर करने वाले यात्रियों पर डाला जाना है. माल भाड़े में भी वृद्धि की बात की जा रही है.

दुर्घटनाओं की बात की जाए तो इसकी सूची और भी लंबी है. पिछले पांच साल में जितनी नई रेलगाड़ियां चलीं हैं उस अनुपात में रेल दुर्घटना अधिक हुई है. कारण यह कि ट्रेनें बढ़ी, ट्रैक नहीं बढ़ाए गए. कई महत्वपूर्ण पद अभी भी खाली पड़े हैं. दो महीने पहले तक रेलवे बोर्ड का कोई चेयरमैन तक नहीं था. भर्तियां नदारद है और तकनीक पुरानी हो चुकी है. आलम यह है कि हम अभी भी अंग्रेजों के जमाने वाले सिग्नल प्रणाली का उपयोग कर रहे हैं.   
यह एक  अलग सच्चाई  है कि भारतीय रेल दुनिया की सबसे ज्यादा कर्मचारी वाला अकेला संगठन है. इसमें लगभग 16 लाख कर्मचारी कार्यरत हैं.

पुरानी हो चुकी सिग्नलिंग सिस्टम और उससे भी ज्यादा बोझ सह रही पटरियां कब साथ छोड़ देगी यह खुद रेलवे वाले भी नहीं जानते. एक खबर के अनुसार कानपुर के पास मगरवारा और गंगा पुल के बीच एक चटकी हुई पटरी से 18 ट्रेनें गुजार गयी और किसी को भनक तक नहीं लगी.
सुरक्षा के नाम पर रेलवे के पास आरपीएफ, यानी रेल सुरक्षा बल है. यह कहता है- रेलवे सम्पति, यात्री क्षेत्र तथा यात्री की सुरक्षा एवं बचाव, रेलवे के आवागमन या यात्री क्षेत्र में किसी बाधा को हटाना तथा रेलवे सम्पति, यात्री क्षेत्र एवं यात्रियों के बेहतर सुरक्षा एवं बचाव के लिए तत्पर !
हकीकत यह है कि आप किसी आम स्टेशन, एक्सप्रेस या मेल रेलगाड़ी में यदा- कदा हीं पूरी सुरक्षा व्यवस्था पाऐंगे. कारण यह भी है कि राज्य बदलने के साथ रेलवे पुलिस भी बदल जाती है. हालांकि नए रेलमंत्री दिनेश त्रिवेदी ने संसद में कहा कि रेलवे में जल्द ही एकीकृत सुरक्षा प्रणाली शुरू की जाएगी.

आंकड़ों के अनुसार विभिन्न राज्यों की जीआरपी रोजाना 2,200 गाडि़यों में और रेलवे सुरक्षा बल हर दिन औसतन 1,275 गाड़ियों में यात्रियों की सुरक्षा करते हैं. लेकिन हर महीने चोरी और लूट की इतनी घटनाएं भी होती हैं जो दर्ज ही नहीं हो पाती. जबकि रोजाना 7,000 यात्री गाड़ी चलती है.
ऐसा नहीं है कि इस पर किसी की नजर नही जाती, संसद में सलाना रेल बजट पेश होता है और रेलमंत्री समाधान के साथ- साथ परियोजनाओं की घोषणा भी करते हैं. मगर कुछ ही अमल में आता हैं, बाकी सब फाइलों तक सीमित रह जाता है या फिर धीरे- धीरे दशकों बाद पूरा होता है. वो भी राजनीतिक नफे- नुकसान के बाद.
अब बुलेट ट्रेन चलाने की बात की जा रही है जिसकी औसत रफ्तार 300 किलोमीटर प्रति घंटा होती है. हमारे देश की सबसे तेज ट्रेन शताब्दी एक्सप्रेस 150 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से चलती है, वह भी चुनिंदा रूटों पर.
इंडियन रेलवे कंस्ट्रक्शन कम्पनी, जिसे दिल्ली- आगरा- लखनऊ- वाराणसी-पटना के बीच हाई स्पीड रेलगाड़ी के लिये रेल रूट बनाना है, 993 किलोमीटर लम्बे कॉरिडोर के लिये अपनी रिपोर्ट चालू वर्ष के अंत तक सौंपेगी. देखते हैं यह सपनाकब पूरा होता है क्योंकि खर्च 70 करोड़ प्रति किलोमीटर है.

फिलहाल कुव्यवस्था और शिकायतों से घिरी भारतीय रेल यात्रियों को सही सेवा देने में असमर्थ दिख रही है. शायद यह भी एक कारण है कि कभी करोड़ों उगाही करने वाली हमारी राष्ट्रीय संपदाघाटे में चल रही है. सरकार मौन है, यात्री मजबूर.