Tuesday, 27 December 2011

‘कद’ से भी बड़ा हुआ बीसीसीआई


बीसीसीआई ने क्रिकेट की दुनिया में आज जो मकाम हासिल किया है, वैसा हर कोई अपनी जिंदगी में पाने की इच्छा रखता है। एक समय था जब भारत में क्रिकेट की इस संचालक संस्थआ को कोई जानता तक नहीं था। आज सालाना 100 मिलिन डॉलर की कमाई करता है बीसीसीआई। यानी दुनिया में क्रिकेट का सबसे अमीर बोर्ड।


दशकों पहले सिर्फ नाम की संस्था थी बीसीसीआई और सरकार के रहमो करम पर चलता था बीसीसीआई। लेकिन आज हालात क्या है यह किसी से छिपा नहीं है। शायद यही कारण है कि आज जब सरकार इस पर लगाम लगाने की कोशिश कर रही है, तो उल्टे जवाब देकर सरकार को चुप करा देती है बीसीसीआई। पहले भारत में ही क्रिकेट मैच दिखाने के लिए बीसीसीआई प्रसार भारती को पैसे देता था, मगर 1993 बाद बहुत कुछ बदला, तब भारत एक बार विश्वकप जीत चुका था। क्रिकेट भारतीयों के जेहन में रचने-बसने लगा था और तभी सचिन के साथ-साथ कुछ नए युवा खिलाड़ी टीम में आए, जिन्होंने अपने शानदार खेल की बदौलत देश और दुनिया में फतह के झंडे गाड़े।


बताने की जरूरूत नहीं कि इस खेल संस्था में खिलाड़ी से ज्यादा राजनेता पदासीन हैं। राज्य से लेकर केंद्र तक, सभी क्रिकेट बोर्ड में उच्चाधिकारी राजनेता ही हैं। फिर भी क्रिकेट भारत में खूब फल फूल रहा है। बीसीसीआई की ताकत से आईसीसी भी वाकिफ है और इसके बातों को मामने को विवश है। सही मायनों में आईसीसी विश्व में क्रिकेट की सुप्रीम संस्था है, मगर व्यावहारिक तौर पर ऐसा लगता नहीं।


आईसीसी बीसीसीआई के हस्तक्षेपों पर मुहर लगाता रहता है। चाहे कोई भी मामला देख लीजिए, मामला स्टीव बकनर को अंपायरिंग से हटा दिए जाने का हो, हरभजन सिंह द्वारा एंड्रयू सायमंड्स को गाली देने का हो, रिव्यू सिस्टम पर टांग अड़ाने का हो या आईसीएल में अपने तो अपने, दूसरे देशों के खिलाड़ियों को जाने से रुकवा देना हो। बीसीसीआई पूरी दुनिया की सबसे ताकतवर क्रिकेट बोर्ड है, जिसकी बात या तो मन से या मन मारकर आखिरकार सभी को सुननी पड़ती है। आप इसे बीसीसीआई की मनमानी कह सकते हैं, तानाशाही भी कह सकते हैं। फिर भी मानना पड़ेगा कि भारतीय क्रिकेट या बीसीसीआई ने मनमानी का यह हक कमाया है। यह दौर जगमोहन डालमिया के समय शुरु हुआ। पैसे के साथ उन्होंने बोर्ड के लिए नाम भी कमाया।


बीसीसीआई ने लोगों की नब्ज पढ़ी। युवाओं से लेकर आम लोगों में क्रिकेट के चढ़ते बुखार को समझा था और उसने प्रसार भारती को पैसे देने के बजाय उल्टे प्रसारण अधिकार बेचने की घोषणा की। इस फैसले से बीसीसीआई को करोड़ों-अरबों रुपयों का फायदा हुआ। दुनिया भर के टीवी चैनल देश की बढ़ती अर्थसमझ रहे थे, जिसे भुनाने में भारतीय क्रिकेट बोर्ड कामयाब रहा।


मगर मनमानी की भी एक हद होती है, वो भी जब अपने घर पर काबिज होने लगे तो विरोध होना लाजमी है। सबसे पहले भारत सरकार द्वारा लाए गए खेल विधेयक पर गौर कीजिए। बीसीसीआई को सूचना के अधिरकार के अंतर्गत लाने की कोशिश की गई, बोर्ड ने इसे न सिर्फ लौटाया बल्कि सरकार को नसीहत भी दे डाली। सुझाव देने वालों में खुद सरकार में बैठे लोग शमिल हैं क्योंकि वो बोर्ड के संचालन में भूमिका निभा रहे हैं। केंद्रीय खेल मंत्री अजय माकन भी बेबस नजर आते हैं।

अब बात अनिल कुंबले की करते हैं। बीसीसीआई से उनका कभी टकराव नहीं रहा, हमेशा टीम हित और उससे ज्यादा देशहित और खिलाड़ियों के समर्पण भाव के लिए वो जाने जाते रहे। चाहे वह ऑस्ट्रेलिया में हरभजन-साइमंड्स विवाद रहा हो या घायल होने के बाद भी मैदान में हाजिरी। नेशनल क्रिकेट अकादमी के अध्यक्ष पद से इस्तीफा देना कुंबले नहीं बीसीसीआई पर सवाल खड़े करता है। सबको पता है कि चाबी किसके पास है और प्यादा चलता कैसे है। इसलिए कुंबले ने कहा कि वो सिर्फ नाम का पद नहीं चाहते।


इससे स्पष्ट होता है कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड में कई ऐसे पद हैं जो सिर्फ नाम के हैं और काम कहीं और से क्रियान्वित होता है।  दरअसल खामी बोर्ड में नहीं इसके मोल भाव को बढ़ाने वालों में है। वह भी तब, जब बीसीसीआई सरकारी या राष्ट्रीय संस्थान न होने के बावजूद बराबरी का कद रखता हो।
(www.zeenews.india.com/hindi में published)

Saturday, 24 December 2011

दिल्ली की सर्दी- हमें सताती है, आपको याद आती है...


पिछले दिनों 'बिग बी' यानी अमिताभ बच्चन साहब का ब्लॉग पढ़ने का मौका मिला। खबरों के जरिए भी पता लगा कि महानायक अमिताभ को दिल्ली की सर्दी बहुत याद आ रही है। खासकर उन्हें अपनी जवानी के दिन याद आ रहे हैं। मुझे भी लग रहा है कि चांदनी चौक के पराठे, बंगाली स्वीट्स के चाट और साउथ एवेन्यू से तीन मूर्ती जाकर बस से कॉलेज जाने तक में ठंड का एहसास उनके मन को आज भी गुलाबी बना देता होगा।

वैसे भी गुलाबी ठंड की दस्तक देते ही दिल्ली का दिल और मूड रोमानी हो जाता है। बहुत से लोगों को इसका इंतजार होता है को कईयों को तरसाती है दिल्ली की सर्दी। खाने पीने के लिए तो दिल्ली वैसे भी मशहूर है और जब ठंडी में गरम चाय पराठे और चाटपटी चाट मिले तो फिर क्या कहना?


बात फिर से बच्च्न साहब की करते हैं। मुंबई में रहते हुए वो जरूर किसी न किसी चीज को मिस करते हैं। अमिताभ ने कहा, ‘वह रोमांच, वह सादगी, वह विश्वास अब सब चला गया। हम रात में अपने घर के दरवाजे और खिड़कियां खोलकर सोते थे। घर के दरवाजे कभी बंद नहीं किए जाते थे। कभी कभी तो हम घर के बाहर या छत पर सोते थे। कोई सुरक्षागार्ड नहीं बस एक बेफिक्र जीवन

क्या कीजिएगा अमिताभ साहब, हम नौजवान अपनी छोटी सी मौज मस्ती भरे पल में कुछ न कुछ रोमांचक तो कर ही लेते हैं। हमारे लिए न सुरक्षा बाधा है और न कोई चार दीवारी, बस उन्मुक्त होकर पंक्षी की तरह जी रहे हैं। हम आपकी स्थिति को समझ सकते है। बड़े लोग बड़ी और कड़ी सुरक्षा में रहते हैं।

यहां दिल्ली में हर मौसम का मजा लिया जा सकता है। हम सर्दी में सिसकियां लेते है, गर्मी में लू भी झेलते हैं और 'रोमांसिग इन द रेन ऑफ देल्ही' का भी मजा चखते हैं। अगर कमरा उपरी मंजिल पर हो तो डांसिंग इन रेन का भी लुफ्त उठाते हैं।

खाने पीने से घूमने तक अब आपको हमेशा याद करेंगे बच्चन साहब। दिल्ली से आपने अपने दिल को जोड़ा इसका धन्यवाद। हम तो अपने दोस्तों के साथ दिल्ली के रेस्त्रां और बाजार संग मॉल का मजा ले रहे हैं। हां अब खुली खाट पर बैठकर तड़के और रोटी वाली थाली यहां नहीं मिलती, इसके लिए दूर तक जाना पड़ता है। कुछ चमक ए.सी और एक दूसरे का हाथ थामे फूड क्लब में जाकर प्रेम में डूबने का मन और मौका मिल ही जाता है।


कितना अच्छा होता अगर आप से पत्र द्वारा त्वरित बात कर पाता, पर अब ब्लॉग का दामन है। इसी पर बोलकर अपने मन की बात कह देता हूं। आशा है आगे भी कुछ दिलचस्प बातों से सामना होगा। अमिताभ साहब की बातों से अब मुझे मेरे मित्र की बात याद आती है, वो हमेशा कहा करता है कि समाज में आपका कद जितना बड़ा होता है, यहां छिपने की जगह उनती ही कम हो जाती है। फिर भी आपने अपने कद और अपनी छाया को कुछ हद तक तो छुपा ही लिया है।

Monday, 5 December 2011

भ्रष्टाचार को आड़, एफडीआई पर वार

जब अन्ना हजारे ने अगस्त में जनलोकपाल के लिए आंदोलन कर रामलीला मैदान में अपना अनशन खत्म किया, उस समय केंद्र सरकार ने यह भरोसा दिलाया कि संसद के आने वाले शीतकालीन सत्र में इस बिल को पारित कर भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्त कानून बनाया जाएगा। अन्ना की भी यही मांग थी और लोगों को इसी का इंतजार था कि आखिर इस आंदोलन का अंजाम भ्रष्टाचार का रोकथाम होगा या नहीं।

अब शीतकालीन सत्र भी शुरु हो गया है लेकिन दो सप्ताह बाद भी लोकपाल बिल की चर्चा तक नहीं हुई है। सरकार भी खुश है कि मीडिया, जनता और विपक्ष का ध्यान एक नए मुद्दे की तरफ आकर्षित हुआ। इसे सरकार की चालाकी कहें या कमजोरी- जनलोकपाल, भ्रष्टाचार, संचार घोटाला, राष्ट्रमंडल खेल धांधली तथा भूमि विवाद जैसे मुद्दों को दबाने के लिए एफडीआई को अचानक से चर्चा का विषय बना दिया। कह सकते हैं कि भ्रष्टाचार के मुद्दे पर आड़ लेने के लिए सरकार ने खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश का नया झुंझुना सबके हाथ थमा दिया। नतीजा आपके सामने है, सब एफडीआईकर रहे हैं।

याद कीजिए पिछले दिनों यात्राओं का दौर निकल पड़ा था। 11 अक्तूबर को आडवाणी ने अपनी छठी राजनीतिक यात्रा जन चेतना की शुरुआत जयप्रकाश नारायण की जन्मस्थली सिताबदियारा (बिहार) से की। योग गुरु बाबा रामदेव ने अपनी 10 हजार किलोमीटर की भारत स्वाभिमान यात्रा झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि से 20 सितंबर से शुरू की। आगामी यूपी चुनाव में जीत के इरादे को आधार देने के लिए सपा के प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश यादव ने बसपा के खिलाफ क्रांति रथयात्रा निकाली। रही सही कसर राहुल गांधी ने पूरी की। कांग्रेस के राजा बनने को तैयार राहुल की चुनावी व व्यापक जन संपर्क यात्रा भी यूपी से शुरु हुई। इसके अलावा उपवास, व्रत और धरना अलग है, जो अन्ना और अन्य राजनेता कर रहे या कर चुके। ये सब धरे के धरे रह गए और आ गया एफडीआई।  


इस बीच संसद के शीतकालीन सत्र पर हम सब सांसद और सदन की कार्रवाही पर जैसे ही नजर डालते थे, आशा करते कि कुछ तो चर्चा देखने मिले, पर सभापति दो मिनट में पहले सदस्यों को शांत कराते और दूसरे क्षण परेशान होकर सदन स्थगित कर देते। मजेदार बात तो यह कि इधर संसद बाधित होती थी और उधर राहुल गांधी लाईवहो जाते थे। युवक कांग्रेस सम्मेलन बुनियाद तो बार-बार ब्रेकिंग बनता रहा।

संसद के शीतकालीन सत्र में पहले तीन दिन तक यूपी बंटवारा, पी चिदंबरम का मुद्दा हंगामा बरपाता रहा। सरकार भी संकट मोल नहीं लेना चाह रही। साथ ही सरकार को यह भी डर सता रह है कि अगर संसद में सब कुछ सुचारू रूप से चलता रहा तो कालेधन और संचार घोटाले के साथ-साथ अन्य मुद्दों पर भी विपक्ष उसे घेरेगा, जिसपर कहीं न कहीं सरकार तत्काल कमजोर नजर आ रही है। सरकार की तरफ से सबसे बड़े संकट मोचकों में से एक पी चिदंबरम का 2-जी आवंटन घोटाला में नाम अना भी सरकार के लिए एक परेशानी है।

अगर गौर से देखा जाए तो विपक्ष की यह मांग अवसरवादी नजर आता है। यह सही है कि पी चिदंबरम का नाम 2-जी स्पेक्ट्रम घोटाले में आ चुका है, लेकिन संदेह के बादल एनडीए सरकार तक फैले हुए हैं। शीशे के घरों में रहने वाले दूसरों पर पत्थर उछालते रहें तो रोजाना टूटने की आवाजें आएंगी ही।

बार-बार सत्र के बाधित होने और महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा न होने से देश का कितना नुकसान होता है, यह हमारे सांसद बेहतर समझते हैं, जनता जो भुगतती है, सो अलग। इस बार बाधा पहुंचाने के मुद्दों में गृहमंत्री का बहिष्कार भी शामिल हो गया है। विपक्ष की मांग है कि गृहमंत्री पी चिदंबरम 2-जी स्पेक्ट्रम मामले में बराबर के दोषी हैं, इसलिए उन्हें इस्तीफा देना चाहिए।


राजनीतिक शुचिता बनाए रखना हो तो कोई भी गंदगी नहीं रहनी चाहिए। भ्रष्टाचार पर मंत्री और सरकार के चरित्र की बात करने वाला विपक्ष इस बात को अच्छी तरह समझता है। लेकिन उसका मकसद किसी न किसी प्रकार सरकार को परेशानी में डालना है,  इसलिए शीतकालीन सत्र के पहले यह तय कर लिया गया कि पी चिदंबरम का इस्तीफा मांगा जाए। दूसरी ओर केंद्र सरकार की नीयत भी कोई पाक साफ नहीं है। हंगामे के बीच सरकार शीतकालीन सत्र पूरा कर लेगी और देश हित के जरूरी मुद्दे पीछे छूट जाएंगे।

जन प्रतिनिधियों को तो संसद में बैठकर नियम बनाना और कुछ महत्वपूर्ण फैसले लेने होते है, पर लगता नहीं कि वो इस पर गंभीर हैं। संसद में 31 से ज्यादा बिल लंबित है, कुछ जरूरी बिल जिस पर लोगों के साथ–साथ विशेषज्ञों की भी नजर है उनमें-
·         व्हिसल ब्लोअर विधेयक पेश किया जाना है, जिसमें किसी सरकारी मुलाजिम द्वारा अधिकारों का दुरुपयोग करने या भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायत किए जाने और शिकायतकर्ता को सुरक्षा दिए जाने का प्रावधान है।
·         राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा विधेयक है, जिसमें गरीब जनता को न्यूनतम मूल्य पर भोजन उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
·         भूमि अधिग्रहण विधेयक जैसे महत्वपूर्ण विधेयकों पर मौजूदा सत्र में चर्चा होनी थी और इनके पारित होने पर फैसला होना बाकी है।
·         जन लोकपाल तो पहले ही शीतकालीन सत्र में पास कराने की सरकार की बाध्यता बनी हुई है। इस मुद्दे पर अन्ना के आंदोलन को कौन भूल सकता है।


अब सवाल यह है कि क्या यह मसला मीडिया के प्राइम टाइम मसाले और राजनेताओं के बैठक और विरोध तक सामित रह जाएगा या सरकार इसे मकाम पर पहुंचाएगी? रीटेल क्षेत्र में एफडीआई को सरकार महंगाई, बेरोजगारी, आर्थिक विकास और लोगों के हित से जोड़कर दिखा रही है, मगर आम जनता को रीटेल स्टोर के एफडीआई और मेगा स्टोर पर जाने की कितनी फिक्र है, यह हम आप अच्छी तरह जानते हैं। यह न तो शाइनिंग इंडिया है, न भारत उदय है और न ही भारत निर्माण। 
www.zeenews.india.com/hindi/news/category/ज़ी-स्पेशल में प्रकाशित